आधुनिकता के कारण खत्म हो रही चौपाल की परंपरा

Updated at : 03 Jul 2017 5:51 AM (IST)
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आधुनिकता के कारण खत्म हो रही चौपाल की परंपरा

छपरा(नगर) : चिड़ियों की चहचहाहट के बीच किसी विशाल बरगद के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर लगने वाला चौपाल गांव की सभ्यता और संस्कृति को प्रदर्शित करने का प्रमुख केंद्र था. किस के खेत में इस साल बढ़िया पैदावार हुई है, किसकी बेटी की शादी तय करनी है. ऐसी बात गांव की चौपाल पर […]

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छपरा(नगर) : चिड़ियों की चहचहाहट के बीच किसी विशाल बरगद के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर लगने वाला चौपाल गांव की सभ्यता और संस्कृति को प्रदर्शित करने का प्रमुख केंद्र था. किस के खेत में इस साल बढ़िया पैदावार हुई है, किसकी बेटी की शादी तय करनी है. ऐसी बात गांव की चौपाल पर आम तौर पर हुआ करती थीं. अब गांव में लगने वाले चौपाल की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो गयी. हालांकि कुछ गांव ऐसे हैं, जहां रविवार को गांव के टीले पर चौपाल जरूर लगता है.

, पर समय के साथ उस चौपाल पर होने वाली सामाजिक सरोकार की बातें अब खत्म हो चली हैं.
रेडियो भी बजता था चौपाल में : रसूलपुर के घुरापाली निवासी बुजुर्ग सीताराम प्रसाद बताते हैं कि उनके युवावस्था में गांव की चौपाल न सिर्फ एक परंपरा थी, बल्कि मनोरंजन का भी केंद्र हुआ करता था. उनके जमाने में गांव में गिने-चुने घरों में ही रेडियो उपलब्ध था. जिस दिन रेडियो पर कोई खास कार्यक्रम आने वाला होता ब्रह्मस्थान के पास घने पेड़ के नीचे बना चबूतरा जहां चौपाल लगा करती थी वह गुलजार हो जाता था. गांव के बुजुर्ग और युवा घरेलू काम जल्दी-जल्दी निबटा कर गांव की चौपाल पर पहुंच जाते थे,
फिर घंटो रेडियो में आने वाले अपने पसंदीदा कार्यक्रम को बड़े चाव से सुना करते थे. इस बीच अगर किसी के घर से बुलावा आ जाता तो मानो पहाड़ सा टूट पड़ता. सीताराम प्रसाद बताते है कि चौपाल पर सिर्फ सुबह में ही नही बल्कि शाम को भी खूब मजमा लगता था.
चौपाल पर होती थी स्वस्थ चर्चाएं : चौपाल पर गांव की सामाजिक गतिविधियां तय हुआ करती थीं. पकवाइनार के बुजुर्ग दयानाथ उपाध्याय बताते हैं कि सत्तर-अस्सी के दशक में गांव में चौपाल का काफी महत्व था. चौपाल पर अधिकतर स्वस्थ चर्चा हुआ करती थीं. राजनीति उस वक्त भी हावी थी पर चौपाल में किसी पार्टी विशेष के पक्ष पर चर्चा करते वक्त लोग हावी नहीं हुआ करते थे. चर्चाओं में इत्मीनान था और छोटे-बड़े सबकी बातों को सुना जाता था. आज भी गांव में कभी-कभार बुजुर्गों और युवाओं के बीच चर्चाएं होती हैं पर उसका स्वरूप चौपाल की तरह नहीं दिखता. आज हर कोई अपने धुन में मस्त है. शादी-ब्याह और पर्व त्योहारों में ही एक दूसरे से मिलना हो पाता है.
समय के साथ खत्म हो गयी परंपरा : समय के साथ गांव में भी शहरी कल्चर हावी होने लगा है. वाट्सअप और फेसबुक ने चौपाल की चर्चाओं पर अपना असर डाला है. शाम की चौपाल की जगह अब टेलीविजन ने ली वहीं सुबह की खुशनुमा चर्चाएं अब भागदौड़ भरी जिंदगी में कहीं खो गई है. चौपाल की जगह अब चर्चाओं के लिए गांव के बाजारों पर बने चाय दुकानों पर लोग इकट्ठा होने लगे हैं. चर्चाओं का विषय भी अब कुछ खास नहीं है. कभी क्रिकेट तो कभी फिल्म युवा वर्ग अक्सर इन्ही विषयों पर चर्चा करते दिखाई पड़ते हैं. बुजुर्गों में भी अब चौपाल पर आने का चाव नहीं दिखता. जिस चौपाल से गांव की परंपरा और रिवाजों की खुशबू आया करती थी आज बदलते वक्त में आधुनिकता उसपर हावी होने लगी है.
हंसी-ठिठोली के बीच बीत जाती थी शाम
सुबह के साथ शाम में भी गांव की चौपाल गुलजार हुआ करती थी. लालटेन या ढिबरी की रौशनी में दिनभर के काम से फुरसत पाकर लोग अपने-अपने मुद्दों के साथ चौपाल पर पहुंच जाते थे. रिविलगंज के नन्दकिशोर सिंह बताते हैं कि बुजुर्गों की अलग टोली बैठा करती थी और युवाओं की अलग. अगर युवा वर्ग किसी गंभीर मुद्दे पर चर्चा कर रहा हो तो बुजुर्ग उसमें अपने विचार भी रखते. जेनरेशन गैप नहीं था. हंसी मजाक भी काफी संयमित ढंग से हुआ करता था. कभी-कभी किसी की ज्यादा खिंचाई भी हो जाती थी और वह नाराज नहीं होता था.
चौपाल में होते थे कई अहम फैसले
अगर गांव के किसी व्यक्ति के घर शादी-विवाह का समारोह होने वाला हो, तो उसकी पूरी तैयारी चौपाल में बैठ कर ही कर ली जाती थी. अतिथियों का स्वागत कौन करेगा, पुराने रास्ते की मरम्मती कैसे होगी, गांव का इनार(कुएं) कैसे साफ किया जायेगा जैसी कई बातें चौपाल पर होने वाली सुबह की चर्चा में ही तय कर ली जाती थीं. शहर के साथ उस समय उतना जुड़ाव नहीं था. साधन की कमी थी और मोबाइल का भी जमाना नहीं था. इस हफ्ते शहर कौन जा रहा है. लोग बताने से घबराते भी नहीं थे और अगर किसी को कोई जरूरी सामान मांगना हो तो उस व्यक्ति को पैसे और लिस्ट थमा दी जाती थी.
क्या कहते हैं ग्रामीण
हमारे समय में न सिनेमा हॉल था न टेलीविजन, गांव की चौपाल पर ही देश दुनिया की बातें पता चलती थीं. हम तो चुपचाप बैठ कर बस बुजुर्गों की बातें सुना करते थे. बहुत अच्छा लगता था.
सीताराम प्रसाद, घुरापाली
चौपाल ग्रामीण संस्कृति की पहचान है. आज भी हमारे गांव में कभी-कभी छुट्टियों में हम एक जगह इकट्ठा होकर चर्चाएं करते हैं. हालांकि अब समय का काफी अभाव है. चौपाल से बहुत कुछ सीखने को मिलता था. पूरे गांव की खबर भी मिल जाती थी.
त्रिभुवन रस्तोगी, परसागढ़
समय के साथ चौपाल की परंपरा खत्म हो चली है. युवा वर्ग आधुनिक हो गया है. बड़े-बुजुर्गों के पास बैठने का समय किसी के पास नहीं है. पहले तो खेती-बाड़ी से लेकर शादी ब्याह तक की चरचा चौपाल पर हुआ करती थी.
दयानाथ उपाध्याय, पकवाइनार
युवावस्था में मैं अक्सर गांव की चौपाल पर जाता था. हर प्रकार की बातें सुनने को मिलती थी. उन बातों में महज मनोरंजन नहीं होता, बल्कि कई बार कुछ सीखने को मिलता था. सामाजिक ज्ञान का भी बोध होता था.
नंदकिशोर सिंह, रिविलगंज
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