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कृषि विपणन को प्रत्यक्ष बाजार से जोड़ने की जरूरत : जिर्ली

Updated at : 22 May 2024 11:17 PM (IST)
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कृषि विपणन को प्रत्यक्ष बाजार से जोड़ने की जरूरत : जिर्ली

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा द्वारा वर्चुअल मोड में आयोजित तीन दिवसीय राष्टस्तरीय प्रशिक्षण का समापन बुधवार को हुआ.

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पूसा : राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रबंधन संस्थान हैदराबाद व एमओए एंड एफडब्ल्यू भारत सरकार के सहयोग से कृषि विपणन में आजीविका के विषय पर आधारित डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा द्वारा वर्चुअल मोड में आयोजित तीन दिवसीय राष्टस्तरीय प्रशिक्षण का समापन बुधवार को हुआ. इसमें शामिल ईसीएआर केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान शिमला के प्रधान वैज्ञानिक सह कृषि विस्तार प्रभाग प्रमुख डॉ आलोक कुमार ने जीविका के अवसरों में सामाजिक लेखा परीक्षा का महत्व’ विषय पर व्याख्यान दिया. उन्होंने कहा कि सोशल ऑडिट प्रबंधन को संगठन के प्रदर्शन का मूल्यांकन व आकलन करने का आवश्यक प्रदान करता है. साथ ही, सामाजिक लेखा परीक्षा आयोजित करके संस्थान अपने वर्तमान प्रदर्शन और उनके बीच के अंतर का पहचान कर सकता है. निदेशक बहु-विषयक विकास अनुसंधान केंद्र (सीएम डीआर) धारवाड़ के डॉ. बी. जिर्ली ने कृषि विपणन को प्रत्यक्ष बाजार से जोड़ने की बातों को रखा. बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के प्राध्यापक सह विभाग प्रधान प्रसार शिक्षा के डॉ वसंत कुमार झा ने एफपीओ से जुड़े विस्तृत चर्चा की. उन्होंने कृषि से जुड़े उपकरणों की कस्टम हायरिंग की जानकारी दी. ईसीएआर केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान शिमला के वैज्ञानिक डॉ. विकास मंगल ने कृषि विपणन में ‘आर’ सॉफ्टवेयर का अनुप्रयोग से जुड़े प्रशिक्षण दिया. उन्होंने बताया कि बहुत सारे छोटे व्यापारी और किसान अपने डाटा को एनालाइज करने के लिए, सॉफ्टवेयर नहीं खरीद सकते हैं लेकिन आर. सॉफ्टवेयर मुफ्त में उपलब्ध है. यह बहुत ही कम कंफीग्रेशन में चल जाता है. इसके द्वारा डाटा को एनालाइज करके मार्केट इंटेलिजेंस को समझा जा सकता है. अतः छोटे-छोटे व्यापारी भी इसका लाभ उठा सकते हैं. ‘आर’ विश्लेषण सॉफ्टवेयर से बाजार विश्लेषण, पूर्वानुमान मांग की पहचान, बिक्री विश्लेषण, आपूर्ति श्रृंखला अनुकूलन ग्राहक विभाजन एवं विजुलाइजेशन बनाने पर जोर दिया. कार्यक्रम को ऑर्डिनेटर डॉ. सत्य प्रकाश ने कहा कि जागरूकता पैदा करने एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए सोशल मीडिया कृषि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. उन्होंने यह भी बताया कि सोशल मीडिया पर आजीविका बढ़ाने वाली कृषि विपणन को बढ़ावा देने के लिए इनफ्लुएंसर मार्केटिंग का उपयोग किया जा सकता है. कार्यक्रम के संचालन करते हुए डॉ सुधानन्द प्रसाद लाल ने कहा कि दुनियाभर में किसानों को उपभोक्ताओं के खर्च का बमुश्किल एक-चौथाई ही मिलता है. उन्होंने यह भी बताया कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार भारत में उपभोक्ताओं के रुपये में किसानों की औसत हिस्सेदारी विभिन्न खाद्य पदार्थों के लिए मात्र 28 से 78 प्रतिशत के बीच पायी गई है. अतः कृषि मार्केट सुदृढ़ीकरण जरूरी है. प्रशिक्षण कार्यक्रम में 19 राज्य, 1 केन्द्र शासित प्रदेश, 55 विभिन्न संस्थानों के 161 प्रशिक्षणार्थियों ने भाग लिया. धन्यवाद ज्ञापन डॉ सत्य प्रकाश ने किया.

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