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मटेश्वर मंदिर में लगा ताला, अगले आदेश तक पूजा बंद

Updated at : 03 Jul 2020 8:13 AM (IST)
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मटेश्वर मंदिर में लगा ताला, अगले आदेश तक पूजा बंद

मटेश्वर मंदिर में लगा ताला, अगले आदेश तक पूजा बंद

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सिमरी : सिमरी बख्तियारपुर अंतर्गत बलवा हाट स्थित मिनी बाबा धाम के नाम से मशहूर बाबा मटेश्वरधाम में न्यास समिति के आये निर्णय के बाद एक आपातकालीन बैठक आयोजित की गयी. बैठक की अध्यक्षता बाबा मटेश्वर न्यास समिति के अध्यक्ष डॉ अरुण कुमार यादव ने की. डॉ अरुण यादव ने कहा कि न्यास समिति के द्वारा सावन में मंदिर में पूजा नहीं करने को लेकर आदेश आने के बाद यह निर्णय लिया गया है कि हर साल की भांति सावन में बाबा मटेश्वर मंदिर में लगने वाले श्रावणी मेले को स्थगित किया जाता है. इस दौरान मंदिर में किसी भी तरह की पूजा पर रोक लगा दी गयी है. इधर बैठक के बाद मंदिर में न्यास समिति के अध्यक्ष की उपस्थिति में मंदिर में ताला लगा दिया गया है.

ज्ञात हो कि जिले के सिमरी बख्तियारपुर स्टेशन से 13 किलोमीटर दूर कांठो पंचायत स्थित बाबा मटेश्वर धाम का शिवलिंग स्वयं अंकुरित है. 22 एकड़ जमीन के बीच लगभग 25 फीट ऊंचे टीले पर यह शिव मंदिर अवस्थित है. बाबा मटेश्वर धाम का शिवलिंग ढाई फीट ऊंचा एवं चार फीट मोटा है. शिवलिंग व उसका चबूतरा काले पत्थर का है. लेकिन शिवलिंग कहीं भी उस चबूतरे को नहीं छूता है. अष्टदल में कटे शिवलिंग व चबूतरे के बीच चारों ओर एक इंच का शून्य स्थान है. जिसमें सालों भर जल भरा रहता है. यहां पूजा-अर्चना के लिए आने वाले श्रद्धालु इसी जल को प्रसाद समझ ग्रहण करते हैं.

इस जल की भी अपनी अलग कहानी है. चैत-वैशाख के महीने में जब धरती का जल स्तर नीचे चला जाता है, तब यह नीर बाहर निकलता रहता है और सावन – भादो के महीने में जब धरती का जलस्तर उपर आता है, तब इस शून्य स्थान का नीर नीचे चला जाता है. मंदिर में शनि की भी अनोखी मूर्ति है. यहां साल 2007 में यहां आये जगद्गुरु शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती ने भी कहा था कि ऐसा अद्भुत शिवलिंग पहली बार देखा है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण पटना से जनवरी 2007 में आये अधीक्षण पुरातत्वविद् भारत सरकार के मणिकांत मिश्र ने सर्वेक्षण के क्रम में अपनी टिप्पणी में लिखा है कि यहां बहुत ही अद्भुत, अनोखा व अविस्मरणीय शिवलिंग स्थापित है. इस मंदिर के पौराणिकता की कहानी खुदाई के दौरान मिले पत्थर के किवाड़ व चौखट बताते हैं. विशालकाय पीपल के पेड़ के नीचे रखे ये पत्थर भी आस्था का केंद्र बन आज पूजे जा रहे हैं.

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