मंच व सम्मान की दुनिया के नेपथ्य में साहत्यिकार शालग्रिाम

Published at :06 Jan 2016 6:45 PM (IST)
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मंच व सम्मान की दुनिया के नेपथ्य में साहत्यिकार शालग्रिाम

मंच व सम्मान की दुनिया के नेपथ्य में साहित्यकार शालिग्रामप्रभात शख्यीयतआधा दर्जन पुस्तकों की रचना के बाद भी जारी है लेखन का सफर शहर के कायस्थ टोला में गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं लेखकफोटो- शालिग्राम 6 व 7- साहित्यकार शालिग्राम एवं उनकी प्रकाशित पुस्तकेंकुमार आशीष, सहरसा नगर हमने दुनिया बसा ली है शब्दों के […]

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मंच व सम्मान की दुनिया के नेपथ्य में साहित्यकार शालिग्रामप्रभात शख्यीयतआधा दर्जन पुस्तकों की रचना के बाद भी जारी है लेखन का सफर शहर के कायस्थ टोला में गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं लेखकफोटो- शालिग्राम 6 व 7- साहित्यकार शालिग्राम एवं उनकी प्रकाशित पुस्तकेंकुमार आशीष, सहरसा नगर हमने दुनिया बसा ली है शब्दों के भीतरखाने में, हम किसी हाल में बेघर नहीं होंगे जमाने में… शायर की यह पंक्तियां हिंदी के प्रख्यात रचनाकार शालिग्राम की रचना व उनके जीवन पर सटीक बैठती हैं. वर्तमान में साहित्य व साहित्यकारों की धमक पांच सितारा होटलों के सभागार व अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं. वैसे समय में भी वर्ष 1952 से लगातार कलम सेवी बन साहित्य के विभिन्न आयामों को पार करनेवाले शालिग्राम आंगन के अहाते में गांव के किसान, मजदूर व मैला ढोने वाले चरित्रों को आत्मसात कर पन्ने पर उकेर रहे हैं. शुरुआती समय में आलोचक व समीक्षक इन्हें फणीश्वर नाथ रेणु का विस्तार कहते थे, लेकिन बाद के समय में प्रकाशित रचनाओं ने पुरानी मिथक को तोड़ उन्हें एक नयी पहचान दी. सिर्फ लिखना ही जिंदगी है…साहित्यकार शालिग्राम बताते हैं कि जमींदार परिवार में पैदा हुआ. लेकिन मन हमेशा समाज के उन अंतिम पायदान पर जीवन बसर कर रहे लोगों पर केंद्रित रहा. इसी का परिणाम रहा कि लेखनी में आंचलिक सुगंध स्वत: आती रही. बीते दिनों को याद करते शालिग्राम कहते हैं कि वर्ष 1934 के प्रलयंकारी भूकंप के महज चार महीने बाद उनका जन्म खगड़िया जिले के पचौत गांव में हुआ था. जिसके बाद शिक्षा-दीक्षा भागलपुर में ही पूरी हुई थी. लड़कपन से शुरू, अब पचपन के पारमहज 18 वर्ष की उम्र में ही वर्ष 1952 में शालिग्राम ने साहित्य की दुनिया में प्रख्यात साहित्यकार डॉ विष्णु किशोर बेचन की कृति इनसान की लाश का संपादन कर हलचल मचा दी थी. इसके बाद शालिग्राम को बाबा नागार्जुन का सानिध्य मिलता रहा, जिसने किसान परिवार के इस युवक को साहित्य जगत का शालिग्राम बना स्थापित कर दिया. फिलवक्त जीवन के 81 बसंत को पार कर चुके शालिग्राम की कलम में अब भी स्याही बचे होने के संकेत मिल रहे हैं. रचनाओं ने दिखाया है रास्ता शालिग्राम की कथा संग्रह पाही आदमी (1963), कविता संग्रह संघाटिका (1970), उपन्यास किनारे के लोग (1996), कीत आउ कीत जाउ (2008), कथा संग्रह नई शुरुआत (2009) व शालिग्राम की सात कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं. वर्तमान में शालिग्राम अपनी आत्मकथा पूरी कर चुके हैं. ज्ञात हो कि राजस्थान के स्कूलों में भी शालिग्राम की इंडो-नेपाल रिपोर्ट शामिल हैं. इसके अलावा इनकी रचना को आधार मान कई लोग रिसर्च भी कर रहे हैं. युवा साहित्यकार शैलेंद्र शैली बताते हैं कि कुछ रचनाओं के जरिये भी लोग देश में ओहदे व सम्मान पा रहे हैं, लेकिन शालिग्राम जैसी शख्सियत को गुमनामी में छोड़ दिया गया है.

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