किसानों को आकर्षित कर रही नीबू की खेती

Published at :06 Dec 2015 6:34 PM (IST)
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किसानों को आकर्षित कर रही नीबू की खेती

किसानों को आकर्षित कर रही नीबू की खेती प्रतिनिधि, केनगर पारंपरिक खाद्यान्न फसलों की खेती की तुलना में नींबू की बागवानी किसानों के लिए अधिक फायदेमंद साबित हो रही है. कम लागत, कम परेशानी से लाखों में आमदनी देख किसान नीबू की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं. जिले के केनगर प्रखंड के तमाम […]

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किसानों को आकर्षित कर रही नीबू की खेती प्रतिनिधि, केनगर पारंपरिक खाद्यान्न फसलों की खेती की तुलना में नींबू की बागवानी किसानों के लिए अधिक फायदेमंद साबित हो रही है. कम लागत, कम परेशानी से लाखों में आमदनी देख किसान नीबू की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं. जिले के केनगर प्रखंड के तमाम रहिका क्षेत्र की बलूई-दोमट मिट्टी नीबू की खेती के लिए वरदान साबित हो सकता है.हालांकि 6 से 6.5 पीएच वाली मिट्टी सबसे अच्छी रहती है. एक एकड़ जमीन में नीबू की खेती कर सालाना लाखों की कमाई की जा सकती है.नीबू की किस्मे नींबू की कई किस्में हैं. जिनमें प्रमालिनी, विक्रम, चक्रधर, साईं शर्बती,अभयपुरी लाइम, गलगल, कागजी, कागजीकलां, करीमगंज लाइम एवं लाइम सिलहट हैं जिसका सर्वाधिक घरेलू उपयोग होता है. पीके एम-1 उच्च पैदावार देने वाले नीबू की बेहतरीन किस्मे हैं. पौधरोपण विधि अगस्त व सितंबर में नीबू के पौधों की रोपाई की जाती है. खेतों में 3 गुणा 3 गुणा 3 फीट आकार के गड्ढे प्रत्येक पौधे के लिए खोदा जाता है. करीब दो-तीन दिन धूप लगाने के बाद हरेक गड्ढे में 20-25 किलोग्राम गोबर की ठीक तरह से गली हुई खाद व एक किलो सुपरफास्ट तथा दीमक से बचाव हेतु 200 ग्राम क्लोरवीर की धूल (पाउडर) को मिट्टी के साथ एक-एक गड्ढे में भर कर पौध रोपण किया जाता और सिंचाई की जाती है. पौधे से पौधे की दूरी पांच मीटर से अधिक रखी जाती है. निराई गुड़ाई व खरपतवार की रोकथाम नीबू की जड़ें जमीन के ऊपरी सतह में फैली रहती है. इस कारण जमीन की गहरी जोताई नहीं की जाती है. बागों के खरपतवार की रोकथाम के लिए प्रति हेक्टेयर 8-10 किलोग्राम सिमेंजिन या ढाई लीटर ग्रमेक्सोन को 500 लीटर पानी में घोल कर छिड़कने से चौड़ी पत्ती वाले एवं सालाना उगने वाली घासें नष्ट हो जाती है. सिंचाई गरमी के मौसम में 10-15 दिनों के अंतराल पर तथा ठंड के मौसम में 4-5 सप्ताह में सिंचाई करनी पड़ती है. वहीं बरसात में जरूरत के हिसाब से पटवन किया जाता है. पटवन के क्रम में पानी को पौधों के मुख्य तनों से दूर रखना जरूरी है. इसके लिए तने के पास मिट्टी का मंद बनाना आवश्यक होता है. वहीं ड्रिप सिंचाई से पानी की बचत खादों का सही उपयोग तथा फसल में बीमारी कम आती है. बागों में जल जमाव नहीं हो इसका पूरा ध्यान रखा जाता है.पौधों की छंटाई पौधों का विकास अच्छा हो इसके लिए ऊपर और बाहर निकलने वाली शाखाओं को काट दिया जाता है. पौधों में 45 सेंटीमीटर लंबाई वाला साफ और सीधा तना ही रहने दिया जाता है. काटे गये तने की जगह बोरोदोक्स नामक रसायन की लेई बना कर लगा दिया जाता है. इस लेई को बनाने के लिए एक किलोग्राम कॉपर सल्फेट डेढ़ किलोग्राम बुझा हुआ चूना को डेढ़ लीटर पानी में मिलाना पड़ता है.उर्वरक प्रबंधन जलालगढ़ कृषि विज्ञान केंद्र की कीट वैज्ञानिक डा सीमा कुमारी ने बताया कि नीबू में कवक, जीवाणु, विषाणु, सूत्र कृमि के संक्रमण से आंद्रगलन रोग लगते हैं. इसके अलावा कीटों के द्वारा लगने वाले रोगों में शल्क, नीबू कैंसर साइट्रस रेडमाइट, ग्रीनमोल्ड एवं मिलीबग आदि प्रमुख हैं. पीथियम फाइटोफ्थोरा एवं राइजोक्टोनियां नामक कवकों के संक्रमण से पौधे जमीन के सतह से गल कर नष्ट हो जाते हैं. इससे बचाव के लिए कवक नाशी दवा से भूमि उपचार करना जरूरी है. मृदा के निर्जर्मीकरण हेतु एक भाग फार्मलीन को 50 भाग पानी में मिला कर नर्सरी की मिट्टी में चार इंच गहराई तक गीला करना पड़ता है. फाइटोलान 0.2 प्रतिशत, पेरिनॉक्स 0.5 प्रतिशत एवं कैप्टान 0.2 प्रतिशत आदि के प्रयोग से पौधों को गलने से बचाया जा सकता है. डाईबैक रोग लगने से पौधों की शाखाएं ऊपर से सूखने लगती है. कैप्टाफोल 0.2 प्रतिशत या कार्बेन्डाजिम 0.1 प्रतिशत का छिड़काव कर इसे रोका जा सकता है. कुछ समय के अंतराल पर इस दवा से तीन बार छिड़काव करना पड़ता है. पौधे में और अधिक रौनक बढ़ाने के लिए 100 ग्राम यूरिया 10 लीटर पानी में घोल कर छिड़कना होता है.नीबू में चूर्णिल आसिता, गैनाडर्मा (जड़गलन) डिप्लोडिया, गमोसिस, शुष्क जड़ गलन, पिंक रोग, हरितिमा और सिट्रस एक्जोकार्टिस (पौधे के तनों के छाल फटने) आदि रोगों का संक्रमण होता है.अंत:वर्ती फसल वैज्ञानिक तौर पर नीबू के बागों में अंत:वर्ती फसल उगाना उपयुक्त नहीं होता है. हालांकि गरमी के मौसम में लोबिया व सेम की पैदावार ली जा सकती है और बरसात में खरपतवार की रोकथाम के लिए हरी खाद वाली फसल लगाना बागों के विकास में सहायक होता है.फल उत्पादन हालांकि पौध रोपण के तीन वर्ष बाद फल मिलना आरंभ हो जाता है. लेकिन चौथे वर्ष से फलों में बढ़ोतरी होने लगती है. पांच साल से ऊपर आयु के प्रत्येक पौधे से 500 से 1000 या इससे और अधिक फल प्राप्त होते हैं. नीबू के पौधे में साल में दो बार फल लगता है. जिससे किसानों को लाखों का मुनाफा हो सकता है. फोटो: 6 पूर्णिया 10परिचय: किसानों के लिए फायदेमंद है नीबू की खेती.

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