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सावन चढ़ते ही पूर्णिया में शुरू हो गई लोक पर्व मधुश्रावणी की सुगबुगाहट

Updated at : 10 Jul 2025 5:30 PM (IST)
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सावन चढ़ते ही पूर्णिया में शुरू हो गई लोक पर्व मधुश्रावणी की सुगबुगाहट

आगामी 15 जुलाई को होगा आगाज, 27 को समापन

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– आगामी 15 जुलाई को होगा आगाज, 27 को समापन

– नव विवाहिताओं को रहता है मधुश्रावणी का बेसब्री से इंतजार

– पूर्णिया में नवविवाहिताओं ने आज से शुरू कर दी है पर्व की तैयारी

विकास वर्मा, पूर्णिया

इस साल शुक्रवार 11 जुलाई को सावन दस्तक दे रहा है और इसी के साथ मिथिलांचल के नव विवाहिताओं का खास पर्व मधुश्रावणी की आहट भी सुनाई पड़ने लगी है. मधुश्रावणी पति के दीर्घजीवन की मंगलकामना करने का सबसे विशिष्ट पर्व है जिसका आगाज 15 जुलाई मंगलवार को हो जाएगा और लगातार 27 जुलाई तक चलेगा. यह मिथिलांचल का अनोखा लोकपर्व है. हालांकि पर्व में चार दिन शेष बचे हैं पर नव विवाहिताएं अभी से इसकी तैयारी में जुट गई हैं. इस बार मधुश्रावणी तेरह दिनों का पर्व होगा. इसमें नव विवाहिताएं सज-धजकर पूजा करती है और शाम में पूजा की थाल सजाती हैं. 27 जुलाई को टेमी दागने के साथ पूजा का समापन होगा. मधुश्रावणी पूजा को लेकर नई दुल्हनों में काफी उत्साह है.

दरअसल, पूर्णिया का इलाका मिथिलांचल का हिस्सा रहा है और आज भी यहां मिथिला की लोक संस्कृति जीवित है जो पर्व त्योहारों के मौकों पर जीवंत हो उठती है. पूर्णिया की बड़ी आबादी इसी संस्कृति को मानती है और यही वजह है कि सावन शुरू होते ही मधुश्रावणी की सुगबुगाहट शुरू हो गई है. नव विवाहिताएं भी इस दिन का बेसब्री से इंतजार करती हैं. यही वह पर्व है जिसमें शादी के बाद पुराने दोस्तों के साथ इसी पूजा में मिलने का मौका मिलता है. इस पूजा का अलग आनंद है. व्रत को लेकर नवविवाहिता महिलाओं में उत्साह का माहौल है. इस व्रत को नवविवाहिता आस्था और उल्लास के साथ मनाती है. मधुश्रावणी को लेकर पूर्णिया की नवविवाहिताओं ने तैयारी शुरू कर दी है. वैदिक काल से ही मिथिलांचल में ऐसी मान्यता है कि पवित्र सावन मास में निष्ठापूर्वक नाग देवता की पूजन करने से दंपति की जीवन की आयु लंबी होती है. व्रत को लेकर डोली दास ने बताया कि तेरह दिनों तक चलने वाला यह पर्व पूजन टेमी के साथ संपन्न होगा. यह पर्व नवदंपतियों के लिए एक तरह से मधुमास है. इस व्रत में माता गौरी व भगवान शंकर की पूजा तो होती ही हैं और विषहरी और नागिन की भी पूजा होती है. प्रथा है कि नवविवाहिता ससुराल से आये हुए कपड़े, गहने ही पहनती हैं. भोजन में फलाहार आदि ग्रहण करती है. पहले और अंतिम दिन की पूजा बड़े ही विस्तार से होती है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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AKHILESH CHANDRA

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