Analysis : सीएम नीतीश का मास्टर प्लान! पहले राज्यसभा, फिर निशांत की एंट्री का ऐलान... एक तीर से साधे कई निशाने?

नीतीश कुमार और उनके बेटे निशांत कुमार. फाइल फोटो
Nitish Kumar Rajya Sabha strategy Analysis : बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव दिख रहा है. नीतीश कुमार सक्रिय राजनीति से अलग हो रहे हैं. उनका राज्यसभा जाना और उनके बेटे निशांत कुमार की जेडीयू में एंट्री. क्या यह सामान्य है! या इसके पीछे 20 साल बिहार की सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाए रखने वाले सीएम नीतीश की जबरदस्त रणनीति की प्लानिंग? खबर में पढ़ें क्या कहती है एनालिसिस.
खबर के ये खास
बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत होती दिख रही है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार की अब सक्रिय राजनीति में एंट्री हो चुकी है. इस बात का ऐलान 6 फरवरी को ही हो गया. आज पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय झा ने यह बात कह दी कि निशांत को किसी सदस्यता की जरूरत नहीं है. वो किसी दूसरी पार्टी में थे. अब खबर है कि उनके लिए युवा नेताओं की एक खास टीम तैयार की जा रही है, जो राजनीतिक गतिविधियों में उनका सहयोग करेगी.
निशांत की टीम में होंगे ये लोग
इस टीम में निशांत के करीबी मित्र रुहेल रंजन, शुभानंद मुकेश, कोमल सिंह और चेतन आनंद जैसे युवा नेता शामिल होंगे. खास बात ये है कि इस टीम में जो भी लोग हैं, उन सभी की लगभग एक जैसी ही पहचान है. ये सभी प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों से आते हैं और राजनीति में उनकी एंट्री भी पारिवारिक पृष्ठभूमि की वजह से ही आसान रही है.
राजनीतिक परिवारों की बढ़ती पकड़
बिहार की राजनीति के लगभग डेढ़ दशक पर निगाह डाली जाए पिछले कुछ वर्षों में यह ट्रेंड रहा है कि बड़े नेताओं के बेटे-बेटियों को सीधे राजनीति में जगह मिल गई है. ऐसे में अब उन युवाओं के लिए राजनीति का रास्ता कठिन है, जो छात्र राजनीति या सामाजिक आंदोलनों से निकलकर प्रदेश की राजनीति में जगह बनाना चाहते हैं. यह रास्ता अब लगभग नामुमकिन सा हो गया है.
छात्र राजनीति से आने वाले नेताओं के लिए बंद रास्ते
बिहार की राजनीति में एक दौर वो भी था. जब नेता छात्र राजनीति और आंदोलन से निकल कर आते थे. बिहार के कॉलेजों से ऐसे कई छात्र नेता उभरे. जेपी आंदोलन ने भी बिहार को कई नेता दिए. एक वो भी दौर था. जब सामान्य घरों से निकला अनजान युवा भी धीरे धीरे प्रदेश की राजनीति में पहचान बना लेता था. लालू, नीतीश, सुशील मोदी, प्रेम चंद मिश्रा, शकील अहमद खान, विक्रम कुंवर जैसे नेताओं के रूप में ऐसे नेताओं की लंबी लिस्ट रही है.
मगर अब बदल चुका है माहौल
लेकिन बिहार की राजनीति का माहौल अब बदल चुका है. पटना विश्वविद्यालय में 2012 से दोबारा चुनाव शुरू हुए. मगर छात्र संघ चुनावों के बाद भी छात्र नेताओं को मुख्यधारा की राजनीति में जगह नहीं मिली. अब तक छात्र संघ के पदाधिकारी रहे युवा नेता किसी बड़े दल से चुनावी टिकट हासिल नहीं कर सके. हाल के दिनों में देखा जाए पिछले 15 -16 सालों में ऐसा नाम नहीं मिलेगा. जो छात्र राजनीति से इलेक्ट्रोरल पॉलिटिक्स का हिस्सा बना हो.
आसान नहीं टिकट की राह
राजनीतिक दलों के टिकट पाने वालों की दौड़ अब सामान्य परिवार के बच्चे नहीं रहे. अब आपको अक्सर वही लोग आगे दिखेंगे, जो बड़े राजनीतिक परिवारों से आते हैं या जिनके पास आर्थिक और प्रशासनिक ताकत का मजबूत बैकअप है. कई बार बड़े अधिकारी या कारोबारी भी नौकरी छोड़कर राजनीति में आते हैं, बावजूद इसके उन्हें भी लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है. इसके उदाहरण भी मौजूद है. आरसीपी सिंह, मनीष वर्मा, आनंद मिश्रा जैसे उदाहरण सामने हैं. टिकट पाने की इच्छा में पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे बाबा बन गए. मगर उन्हें टिकट नहीं मिला. कुछ को लंबा इंतजार करना पड़ा.
निशांत की इंट्री के लिए रचा गया चक्रव्यूह?
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का ये भी आकलन है कि बिहार की राजनीति में अभी जो हो रहा है वह सीएम नीतीश की इच्छा के अनुसार ही हो रहा है. ये बात बिहार की राजनीति पर निगाह रखने वाले नहीं मान रहे बल्कि खुद पार्टी के वरिष्ठ नेता भी कह रहे हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि नीतीश राज्यसभा जाएंगे. मगर राज्यसभा जाकर भी केवल संसदीय काम के लिए दिल्ली जाएंगे. नीतीश बिहार में ही रहेंगे और पार्टी का काम देखेंगे. ऐसे में ये अंदाजा लगाया जा रहा है कि बिहार की राजनीति में अभी जो भी घटना क्रम हो रहा है वह नीतीश कुमार की राजनीति का हिस्सा है. बेटे निशांत कुमार की बिहार की राजनीति में इंट्री के लिए सेफ जोन तैयार करना और पार्टी की कमान उनके हाथ में सौंपने की रणनीति चाल! ऐसे सवाल उठना लाजमी है.
वंशवाद का आरोप लगाए बिना निशांत की इंट्री फिक्स!
राजनीतिक गलियारे में इस बात की भी चर्चा है कि नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले और निशांत की कार्यकर्ताओं की मांग पर बिहार की राजनीति में इंट्री से सीएम नीतीश कुमार की मजबूत समाजवादी नेता की छवि बरकरार रहेगी और सीएम नीतीश जेडीयू को भी अपने हिसाब से चला सकेंगे. यदि सीएम नीतीश राज्यसभा जाए बिना ही निशांत को पार्टी में शामिल कराते तो उन पर भी लालू यादव की तरह परिवारवाद का दाग लगता. जो सीएम के बिहार के विकास पुरुष के विशाल व्यक्त्वि को बौना कर देता. अब निशांत की भावनात्मक और राजनैतिक इंट्री आसान हो जाएगी. इस एंट्री बाद यह सवाल और तेज हो सकता है कि क्या बिहार की राजनीति में वंशवाद की पकड़ और मजबूत हो रही है?
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लेखक के बारे में
By Keshav Suman Singh
बिहार-झारखंड और दिल्ली के जाने-पहचाने पत्रकारों में से एक हैं। तीनों विधाओं (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और वेब) में शानदार काम का करीब डेढ़ दशक से ज्यादा का अनुभव है। वर्तमान में प्रभात खबर.कॉम में बतौर डिजिटल हेड बिहार की भूमिका निभा रहे हैं। इससे पहले केशव नवभारतटाइम्स.कॉम बतौर असिसटेंट न्यूज एडिटर (बिहार/झारखंड), रिपब्लिक टीवी में बिहार-झारखंड बतौर हिंदी ब्यूरो पटना रहे। केशव पॉलिटिकल के अलावा बाढ़, दंगे, लाठीचार्ज और कठिन परिस्थितियों में शानदार टीवी प्रेजेंस के लिए जाने जाते हैं। जनसत्ता और दैनिक जागरण दिल्ली में कई पेज के इंचार्ज की भूमिका निभाई। झारखंड में आदिवासी और पर्यावरण रिपोर्टिंग से पहचान बनाई। केशव ने करियर की शुरुआत NDTV पटना से की थी।
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