नरेंद्र मोदी के फॉर्मूले से जीत की तलाश में नीतीश

Updated at : 10 Jun 2015 2:40 PM (IST)
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नरेंद्र मोदी के फॉर्मूले से जीत की तलाश में नीतीश

पंकज मुकाती कभी नरेंद्र मोदी की चाय पार्टी को शिगूफा और लालू के ट्विटर पर आने को बुढ़ापे में चिड़िया की चीं-चीं कहने वाले नीतीश कुमार भी अब उसी राह पर हैं. ये समाजवादी नेता भी अब वक्त के साथ कदम ताल कर रहा है. गठबंधन का नेता चुने जाने के कुछ घंटे बाद ही […]

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पंकज मुकाती

कभी नरेंद्र मोदी की चाय पार्टी को शिगूफा और लालू के ट्विटर पर आने को बुढ़ापे में चिड़िया की चीं-चीं कहने वाले नीतीश कुमार भी अब उसी राह पर हैं. ये समाजवादी नेता भी अब वक्त के साथ कदम ताल कर रहा है. गठबंधन का नेता चुने जाने के कुछ घंटे बाद ही नीतीश कुमार "बढ़ चला बिहार" के साथ सामने आये हैं. इसमें पिछले दस साल की बिहार की ग्रोथ दिखाई गई है. साथ ही अगले दस साल में बिहार कैसा होगा इस पर चर्चा का रास्ता खोला गया है. बिहार@2025 के जरिये नीतीश अपनी सरकार के काम और भविष्य के सपने दिखा रहे हैं.

पर नरेंद्र मोदी के चुनावी वादों की रैली से ये अलग है. क्यूंकि यदि इसमें भी दस साल के वादे होते तो मोदी के सपनों और जुमले का नेता वाला टैग उनपर भी लग जाता. एक तरह से ब्रांड नीतीश की पैकेजिंग की जा रही है. इसमें अच्छे सेल्समैन और इवेंट मैनेजर के तौर पर खुद को उभारने की कोशिश है. मंगलवार को ही पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि -नरेंद्र मोदी अच्छे सेल्समैन और इवेंट मैनेजर हैं.

इससे एक बात सिद्ध हो गई की मोदी बड़े ब्रांड ही नहीं सफलता के आइकॉन बनकर उभरे हैं. उनके कट्टर विरोधी भी उनके ही फॉर्मूले पर चल रहे हैं. जैसे लोहे की काट लोहा वैसे ही मोदी फॉर्मूले की काट मोदी तरीका ही हो सकता है. नीतीश कुमार ने मोदी के लिए चुनावी रणनीति बनाने वाले प्रशांत कुमार को अपने पाले में खींचा है. होर्डिंग का नारा भी काफी आक्रामक है -एक
बार फिर नीतीश कुमार. पटना के तमाम रिक्शा पर नीतीश के स्टीकर दिखाई दे रहे हैं. बिहार चुनाव में अब तक अकेले और कमजोर दिख रहे नीतीश ने एक दम से फर्राटा भरा है.
ये गति उनके मिजाज से मेल भी नहीं खाती, पर कॉरपोरेट कंपनी में बदलते राजनीतिक दलों और ब्रांड बनते नेताओं के इस दौर में इससे बचा भी नहीं जा सकता. देखना ये होगा कि कितने दिनों तक ये संजीदा और गुमसुम सा अपने में खुश रहने वाला ये नेता बाजार की लिखी हुई स्क्रिप्ट पर चल सकेगा. बहुत संभव है कि एक दिन इस स्क्रिप्टेड दुनिया से मोहभंग हो जाये और नीतीश कुमार फिर अपने ही देसी बिहारी और जमीनी अंदाज़ में सामने आ जायें.
इस अभियान में जनभागीदारी को भी बड़ा महत्व दिया गया है, बहुत हद तक ये केजरीवाल सरीखा है. जाहिर है केजरीवाल ने दिल्ली फतह की है, तो उनका फार्मूला फ़िलहाल अचूक ही माना जायेगा. अगले दस साल में बिहार कैसा होगा इसके लिए जनता की राय ली जाएगी. सेमिनार, लेक्चर, जनसंवाद और सबसे बढ़कर "ब्रेकफास्ट विथ सीएम है. इन फॉर्मूले के बीच कुछ सवाल भी है कि बिहार की राजनीति के सबसे हिट ब्रांड, सबसे टिकाऊ माने जाने वाले नेता को इसकी जरूरत क्यों पड़ी? क्या वाकई वे
अंदर से कमजोर हो गए हैं ? क्या उन्हें अपने काम और वोटरों पर भरोसा नहीं रहा ? आखिर क्यों ब्रांड नीतीश को री-पैकेजिंग की जरूरत पड़ी? क्या इसके पीछे लालू यादव के कार्यकाल से अलग दिखने की कोशिश है?
भारतीय जनता पार्टी के बिहार के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सुशील मोदी अक्सर कहते रहे हैं कि नीतीश ने जो भी अच्छे काम किये वो बीजेपी के साथ रहकर. क्या मोदी की ये बात सही है? आखिर दस साल से बाजार में मजबूती से टिका ये ब्रांड एक दम यू टर्न क्यों ले रहा है. सबसे बड़ी बात बिहार पूरी तरह ग्रामीण प्रकृति का और जातिवादी समीकरणों वाला राज्यहै, यहाँ इस तरह के हाई टेक फॉर्मूले कितने सही हॉट होते हैं, ये देखना होगा. पर एक बात तय है नीतीश कुमार ने आगामी चुनाव में खुद को विरोधियों से आगे कर लिया है. बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती होगी कि वे अब कौनसी राह अपनाते हैं, क्योंकि उनकी राह तो नीतीश कुमार ने पकड़ ली है.
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