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मोकामा : हाइब्रिड मक्के की बालियों में इस साल भी नहीं आये दाने

Updated at : 07 Jul 2019 6:31 AM (IST)
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मोकामा : हाइब्रिड मक्के की बालियों में इस साल भी नहीं आये दाने

मोकामा : मोकामा और आसपास के इलाके में इस साल भी हाइब्रिड मक्का की बालियों में दाने नहीं आये. इसको लेकर किसान मक्के की खेती कर काफी पछता रहे हैं. मालूम हो कि मक्के की फसल पिछले वर्ष भी बांझपन की शिकार हुई थी. इसके बावजूद किसानों ने हिम्मत जुटाकर एक बार फिर मक्के की […]

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मोकामा : मोकामा और आसपास के इलाके में इस साल भी हाइब्रिड मक्का की बालियों में दाने नहीं आये. इसको लेकर किसान मक्के की खेती कर काफी पछता रहे हैं.
मालूम हो कि मक्के की फसल पिछले वर्ष भी बांझपन की शिकार हुई थी. इसके बावजूद किसानों ने हिम्मत जुटाकर एक बार फिर मक्के की बुआई की, लेकिन लगातार दूसरे वर्ष भी उनके मेहनत पर पानी फिर गया. घोसवरी प्रखंड के कुर्मीचक, चकसमया, मालपुर आदि गांवों में मक्के की सर्वाधिक खेती हुई है. वहीं, कसहा दियारा में भी कमोबेश हर किसान ने मक्के की खेती की है. कुर्मीचक निवासी सत्येंद्र कुमार ने बताया कि उन्होंने तकरीबन दो बीघे में मक्का लगाया है. एक बीघे में खेती की लागत दस से पंद्रह हजार रुपये है.
बीज विक्रेता ने एक बीघे में कम- से -कम 25 क्विंटल मक्का उत्पादन की गारंटी दी थी. अब दाने नहीं आने की शिकायत पर दुकानदार पल्ला झाड़ रहे हैं. दुकानदार का कहना है कि बीज तैयार करने वाली कंपनी फसल की जांच करेगी, लेकिन कंपनी के एक भी लोग खेतों का जायजा लेने नहीं पहुंचे हैं. किसान विवश होकर फसल काटकर मवेशियों को खिला रहे हैं.
कुर्मीचक के धर्मेंद्र कुमार ने कहा कि लगातार हो रहे घाटे के सौदे से किसानों की कमर टूट गयी है. मक्के की फसल का ग्रोथ अच्छा हुआ. एक पौधे में तीन से पांच बालियां भी लगी हैं, लेकिन उनमें दाने नहीं आ सके. इसको लेकर मायूसी का माहौल है. उमेश पासवान का कहना है कि मक्के की फसल से काफी उम्मीद जगी थी. किसानों को पिछले साल हुए घाटे की भरपाई का अनुमान था, पर बालियों में लगातार दूसरे साल दाने नहीं देखकर उनके चेहरे की रौनक गायब है.
बढ़ती तपिश से मक्के की फसल हुई बांझपन की शिकार
सूर्य की बढ़ती तपिश वैसे तो जनजीवन प्रभावित कर रही है, लेकिन सबसे खराब असर खेती पर पड़ रहा है. अनुकूल मौसम के अभाव में उपज नगण्य हो रहा है. बाढ़ पौधा संरक्षण विभाग के डाॅ ब्रजेश पटेल ने कहा कि समय पर बारिश का नहीं होना मक्के में बांझपन की मुख्य वजह है. इस बार बारिश नहीं होने पर तापमान में गिरावट नहीं आयी. वैकल्पिक साधनों से पटवन के बाद पौधे का विकास तो हुआ, लेकिन दाने नहीं आये.
दूसरी ओर, घोसवरी प्रखंड कृषि पदाधिकारी अरविंद कुमार ने बताया कि मक्के की खेती के लिए 30 डिग्री तापमान पर्याप्त है, लेकिन तापमान में बेतहाशा बढ़ोतरी हो गयी. इसको लेकर मक्के की खेती बिगड़ गयी. मक्के की बालियों में दाने आने के समय बारिश से तापमान में गिरावट आती है, लेकिन इस साल बारिश कम हुई. इसका असर सब्जी व अन्य फसलों पर भी पड़ा है. विभाग को इसकी जानकारी दी गयी है ताकि किसानों के हित में कारगर कदम उठाया जा सके.
तीन सौ से लेकर हजार रुपये तक प्रति किलो की दर से बीज खरीदा था
धर्मेंद्र कुमार ने जानकारी दी कि तीन सौ रुपये से लेकर एक हजार प्रति किलो की दर से बीज खरीदे गये. बीज बेचने वाले दुकानदार ने मक्के की प्रभेद में सुधार का विश्वास जगाया. तब जाकर किसानों ने इस साल मक्के की खेती करने की हिम्मत की, लेकिन मौसम की मार से परिणाम विपरीत हो रहा है.
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