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IPTA@75 : नाटक और सिनेमा के व्याकरण अलग-अलग, लेकिन जननाट्य में सब कुछ शामिल करना संभव : एमएस सथ्यू

Updated at : 31 Oct 2018 9:03 AM (IST)
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IPTA@75 : नाटक और सिनेमा के व्याकरण अलग-अलग, लेकिन जननाट्य में सब कुछ शामिल करना संभव : एमएस सथ्यू

पटना : नाटक का व्याकरण अलग है और सिनेमा का व्याकरण अलग. इसकी पहचान करने में मुश्किल होती है. हम सबको नाटक के व्याकरण को समझने की जरूरत है. लेकिन, जननाट्य में सब कुछ शामिल किया जा सकता है. यहां किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं होना चाहिए. जननाट्य में कला के सभी स्वरूपों को ग्रहण […]

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पटना : नाटक का व्याकरण अलग है और सिनेमा का व्याकरण अलग. इसकी पहचान करने में मुश्किल होती है. हम सबको नाटक के व्याकरण को समझने की जरूरत है. लेकिन, जननाट्य में सब कुछ शामिल किया जा सकता है. यहां किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं होना चाहिए. जननाट्य में कला के सभी स्वरूपों को ग्रहण करना चाहिए. जननाट्य में निर्देशक एक अच्छी कहानी को प्रस्तुत करनेवाला होता है, ऐसी स्थिति में एक निर्देशक को भाषा सीखने की जरूरत होती है. उक्त बातें चर्चित नाट्य निर्देशक सह इप्टा के राष्ट्रीय मुख्य संरक्षक एमएस सथ्यू ने कहीं.

इप्टा के प्लैटिनम जुबली समारोह पर भारतीय नृत्य कला मंदिर प्रेक्षागृह में चौथे दिन अमृतलाल नागर और एसएम घोषाल की स्मृति में आयोजित इप्टा संवाद के तहत जननाट्य और निर्देशन विषय पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि हमें माइथोलॉजीकल कथा तथा ऐतिहासिक कथा से परहेज नहीं करना चाहिए. अभी-अभी एक नाटक लिखा गया है, जो महाभारत की कथा पर आधारित है ‘श्मशान कुरुक्षेत्र’. यह नाटक युद्ध के खिलाफ शांति के लिए है. वहीं, चर्चित नाट्य निर्देशक परवेज अख्तर ने कहा कि नाटक के कई स्वरूप हैं, जो लोकनाट्य के रूप में कई स्वरूपों में विद्यमान हैं. संवाद का संचालन युवा नाट्य निर्देशक आसिफ अली ने किया.

स्त्री मुक्ति से ही मानव मुक्ति के द्वारा खुलते हैं : शीतल साठे

इप्टा राष्ट्रीय प्लैटिनम जुबली समारोह के चौथे दिन जन सांस्कृतिक आंदोलन और महिलाएं विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोलते हुए सामाजिक कार्यकर्ता और जन गायिका शीतल साठे ने कहा कि महात्मा ज्योतिबा फुले ने बरसों पहले यह बात कह दी थी कि स्त्री मुक्ति से ही मानव मुक्ति का द्वार खुलेगा. शीतल साठे ने कहा कि पूरी लड़ाई ब्राह्मणी व्यवस्था और गैर ब्राह्मणी व्यवस्था के बीच की है, क्योंकि ब्राह्मणी व्यवस्था पुरुषों की व्यवस्था है. रजिया सज्जाद जहीर की याद में यह संगोष्ठी भारतीय नृत्य कला मंदिर के बहुद्देशीय सांस्कृतिक परिसर के सभागार में हुआ, जिसका नाम दीना पाठक-रेखा जैन सभागार है. अपनी मां रजिया सज्जाद जहीर के संघर्षों को याद करते हुए रंगकर्मी नादिरा जहीर बब्बर ने बताया कि उनके परिवार की जड़ों में सियासत है और जब उनके पिता सज्जाद जहीर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल गये थे. परिवार की आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी, ट्यूशन पढ़ा कर मां घर चलाती थीं.

खेती पर संकट यानी देश की अर्थव्यवस्था का संकट : जया मेहता

कृषि संकट का सांस्कृतिक और आर्थिक परिदृश्य पर बोलते हुए डॉक्टर जया मेहता ने दिनों-दिन बढ़ते किसानों की आत्महत्या पर चिंता व्यक्त करते हुए ऐसे किसान की कविताओं की कुछ पंक्तियां सुनाई, जिसने आत्महत्या कर ली, उसका नाम श्रीकृष्ण कदम था. चालीस प्रतिशत किसान भूमिहीन हैं. खेती भी साल भर नहीं होती, जिसकी वजह से गांव से पलायन होता है. खेती का संकट सिर्फ किसानों का संकट नहीं है, बल्कि यह पूरे देश की अर्थव्यवस्था का संकट है. खेती से इतर किसानों को छोटे-छोटे रोजगार में लगाना होगा. छोटे-छोटे रोजगार पर भी कॉरपोरेट का कब्जा होता जा रहा है. केरल के विनय विश्वम ने कहा कि इप्टा ने यहां किसानों पर बातचीत रखी यह गर्व की बात है.

समझने की कोशिश का नाम विज्ञान है : अमिताभ पांडेय

इप्टा राष्ट्रीय प्लैटिनम जुबली समारोह के चौथे दिन मशहूर वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा, प्रो यशपाल की याद में अमर शेख रवि नागर सभागार में ‘विज्ञान और संस्कृति’ पर इप्टा संवाद का आयोजन किया गया. इसमें मशहूर शायर और वैज्ञानिक गौहर रजा तथा अमिताभ पांडेय मुख्य वक्ता थे. गौहर रजा ने कहा कि कोई यह हिम्मत नहीं कर पाता कल्पना करने की कि सृष्टि के पहले कुछ नहीं था, लेकिन विज्ञान इसकी कल्पना करता है. अमिताभ पांडेय ने कहा कि किसी चीज को समझने की कोशिश का नाम विज्ञान है. विज्ञान हमें दृष्टिकोण देता है. इसी से हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्य बनते हैं.

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