पटना : हर सीट के ऊपर ऑक्सीजन मास्क, पर जरूरत पड़े तो नहीं कर सकते इस्तेमाल
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :06 Aug 2018 6:12 AM (IST)
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अनुपम कुमार पटना : पिछले कुछ वर्षों में विमानन प्रौद्योगिकी ने बहुत तरक्की की है. बोईंग-737 और एयरबस-320 जैसे विमानों में हर सीट के ऊपरी पैनल में स्वचालित ऑक्सीजन मास्क लगा होता है. इसके बावजूद एयरलाइंस की संवेदनहीनता के कारण सांस की समस्याओं से ग्रस्त लोगों को तकनीकी विकास का लाभ नहीं मिल पाया है. […]
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अनुपम कुमार
पटना : पिछले कुछ वर्षों में विमानन प्रौद्योगिकी ने बहुत तरक्की की है. बोईंग-737 और एयरबस-320 जैसे विमानों में हर सीट के ऊपरी पैनल में स्वचालित ऑक्सीजन मास्क लगा होता है. इसके बावजूद एयरलाइंस की संवेदनहीनता के कारण सांस की समस्याओं से ग्रस्त लोगों को तकनीकी विकास का लाभ नहीं मिल पाया है. ऐसे यात्री घुटन महसूस होने पर अपनी जरूरत के अनुसार इन आॅक्सीजन मास्क का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं. लिहाजा पांच-सात किलो वजन वाले छोटे ऑक्सीजन सिलिंडर के साथ सफर करना उनकी मजबूरी है.
इसके बावजूद एयरलाइंस प्राय: उनको ढोने से परहेज करते हैं. पटना एयरपोर्ट पर हर दिन दो-चार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जब बोर्डिंग के समय हाथ में या हैंड बैग में छोटे पोर्टेबल सिलिंडर लिये देख यात्री को विमान कंपनियां चढ़ाने से मना कर देती है.
केबिन प्रेशर घटने पर अपने आप निकलते हैं मास्क
केबिन प्रेशर घटने पर अपने आप सीटों के ऊपरी पैनल में लगे सारे मास्क निकल जाते हैं. उनमें ऑक्सीजन की आपूर्ति शुरू हो जाती है. लेकिन, विमान कंपनियोें ने ऐसी व्यवस्था नहीं की है कि सामान्य केविन प्रेशर की स्थिति में दम घुटने का एहसास होने पर कोई यात्री या उनका एक समूह पैनल से ऑक्सीजन मास्क निकालकर अपनी जरूरत के अनुसार उसका इस्तेमाल कर सके
.
फ्लाइट डायवर्ट होने पर 5 से 10 लाख तक का नुकसान
यात्री की तबीयत गंभीर होने पर कई बार विमान को बीच से डायवर्ट कर वापस नजदीकी एयरपोर्ट पर लाने की नौबत भी आ जाती है. ऐसे एक डायवर्जन से एयरलाइंस को पांच से दस लाख तक का नुकसान होता है, जिससे बचने के लिए विमान कंपनियां ऐसे यात्रियों को ढोने से परहेज करती हैं.
पूर्वानुमति की ओट में परहेज का प्रयास
पोर्टेबल ऑक्सीजन सिलिंडर लेकर यात्रा करने के लिए विभिन्न एयरलाइंसों ने प्रावधान बना रखा है कि इसके लिए यात्री को पहले से आवेदन देना होगा. मेडिकल फिटनेस का सर्टिफिकेट देना होगा. हलांकि, ये सारे प्रावधान यात्रियों को रोकने के बहाना मात्र होते हैं.
36 हजार फुट की ऊंचाई पर 20% दबाव और 25% ऑक्सीजन कम
विमान के पांच हजार फुट से अधिक ऊंचाई पर जाने पर हवा का दबाव व उसमें उपस्थित ऑक्सीजन की मात्रा घटने लगती है, जिससे यात्रियों को परेशानी होने लगती है.
आठ हजार फुट की ऊंचाई से अधिक ऊपर जाने पर केबिन के भीतर का दबाव 11 पीएसआई से भी कम हो जाता है, जिसे झेलना मुश्किल होता है. इसे दूर करने के लिए टर्बों ईंजन से कंडीशंड हवा केबिन में पंप की जाती है और उसके भीतर के एयर प्रेशर को नियंत्रित रखने का प्रयास किया जाता है. आमतौर पर बोईंग-737 और एयरबस-320 जैसे विमान 36 से 40 हजार फुट की ऊंचाई पर उड़ते हैं.
इतनी ऊंचाई पर पूरे प्रयास के बावजूद मशीनों की मदद से केबिन प्रेशर को पूरी तरह सामान्य (14.7 पीएसआई) बनाये रखना संभव नहीं होता है. इस दौरान केबिन के भीतर 11 से 12 पीएसआई का दबाव हाे जाता है, जो समुद्र तल के दबाव से 20% कम होती है. केबिन के भीतर का ऑक्सीजन लेवल भी सामान्य से 25%कम होता है.
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