मसौढ़ी : तारेगना, खगौल व तारेगना टॉप कब होंगे विकसित
Updated at : 23 Jul 2018 2:20 AM (IST)
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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की एस्ट्रो टूरिज्म योजना फाइलों में गुम मसौढ़ी : 22 जुलाई 2009 को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया तारेगना (मसौढ़ी), जहां नासा ने सदी का सबसे लंबी अवधि (3.48 मिनट) के लगे पूर्ण सूर्य ग्रहण को देखने की सबसे उपयुक्त जगह बतायी थी. उस वक्त तारेगना में देश व विदेश […]
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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की एस्ट्रो टूरिज्म योजना फाइलों में गुम
मसौढ़ी : 22 जुलाई 2009 को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया तारेगना (मसौढ़ी), जहां नासा ने सदी का सबसे लंबी अवधि (3.48 मिनट) के लगे पूर्ण सूर्य ग्रहण को देखने की सबसे उपयुक्त जगह बतायी थी. उस वक्त तारेगना में देश व विदेश के लाखों सैलानियों का हुजूम उमड़ पड़ा था.
भीड़ से उत्साहित मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने घोषणा की थी कि तारेगना, खगौल व तारेगना टाॅप (बिहटा) के 30 किलोमीटर के लंबे त्रिकोण को विकसित किया जायेगा और यहां खगोलीय त्रिकोण का एस्ट्रो सर्किट का निर्माण कराया जायेगा, लेकिन घोषणा के नौ वर्ष बीत जाने के बाद भी इस दिशा में अब तक कोई सार्थक प्रयास नहीं किया गया.
लोगों का कहना है कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग का एस्ट्रो टूरिज्म प्रोजेक्ट कहीं फाइलों में ही गुम होकर न रह जाये. हालांकि, इसे लेकर दिल्ली व नासा के कई खगौलविदों ने इन क्षेत्रों का अध्ययन करते हुए अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप चुकी है. साथ ही वर्ष 2013-14 के सूबे के बजट में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने एस्ट्रो टूरिज्म प्रोजेक्ट का प्रावधान किया था.
इस प्रोजेक्ट के तहत आर्यभट्ट की कर्मस्थली पटना से सटे तारेगना (मसौढ़ी) खगौल व तारेगना टाॅप (बिहटा) को उनके ऐतिहासिक व खगोलीय महत्व के हिसाब से विकसित करने की योजना थी. इन जगहों पर थीम बेस्ट एरिया एस्ट्रोनाॅमी सेंटर व वेधशाला की स्थापना की जानी थी, लेकिन प्रोजेक्ट अब तक फाइलों से बाहर नहीं निकल पाया है. इससे महान भारतीय गणितज्ञ व खगोलशास्त्री आर्यभट्ट की वेधशाला कहे जाने वाली तारेगना ( मसौढ़ी ) के लोगों के बीच जगी आस एक बार फिर धूमिल होती नजर आ रही है.
तीनों स्थानों का खगोलीय त्रिकोण
एरियल रूट के मुताबिक तारेगना (मसौढ़ी) तारेगना टाॅप (बिहटा) और खगौल एक सामान दूरी करीब 30 किलोमीटर पर स्थित है. तीनों स्थानों को मिलाकर एक खास खगोलीय त्रिकोण बनना है, जो तारों और ग्रहों की सटीक गणना करने में काफी मददगार साबित होता है. इस बात के ऐतिहासिक प्रमाण मिले हैं कि तारेगना में आर्यभट्ट की वेधशाला थी जहां से वह शोध करते थे.
प्रोजेक्ट को लेकर खगोलविदों ने भी दी अपनी राय \
कई खगोलविदों ने आर्यभट्ट प्रोजेक्ट को लेकर अपनी राय दे चुके हैं. खगोलविद अभिताभ पांडेय ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि विशाल कलापूर्ण रेखगणितीय स्मारक चिह्न और आर्यभट्ट का चित्र उकेरा जा सकता है,
जो सूर्य, घड़ी और वर्ष के कैलेंडर का काम करे. आर्यभट्ट संग्रहालय बनाकर उसमें उनकी जीवनी खगोलशास्त्र में उनके योगदान व इस्तेमाल किये गये उपकरणों को प्रदर्शित किया जाये. हालांकि, इनके अलावा स्पेस वैज्ञानिक सचिन बांभा, व अमित वर्मा के साथ-साथ काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान के निदेशक विजय कुमार चौधरी, सहायक निदेशक संजीव कुमार सिन्हा, शोध अन्वेषक मानव रंजन मनमंस एवं विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अमिताभ घोष उस वक्त तीनों जगहों का बारीकी से अध्ययन करते हुए अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है. इसमें उनका साथ स्थानीय निवासी अवकाश प्राप्त शोध पदाधिकारी सिद्धेश्वर नाथ पांडेय ने बखूबी से दिया था.
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