बिहार कांग्रेस को स्थायी अध्यक्ष नहीं मिलने का यह है बड़ा कारण, राहुल गांधी की रणनीति कुछ...

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 31 Jan 2018 1:25 PM

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पटना : बिहार प्रदेश कांग्रेस में इन दिनों कार्यकारी अध्यक्ष काम संभाल रहे हैं. बिहार के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष और हाल तक महागठबंधन सरकार में शिक्षा मंत्री रहे डॉ. अशोक चौधरी को 26 सितंबर 2017 को केंद्रीय नेतृत्व ने पार्टी के अध्यक्ष पद से हटा दिया था. उसके बाद से अभी तक बिहार प्रदेश कांग्रेस […]

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पटना : बिहार प्रदेश कांग्रेस में इन दिनों कार्यकारी अध्यक्ष काम संभाल रहे हैं. बिहार के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष और हाल तक महागठबंधन सरकार में शिक्षा मंत्री रहे डॉ. अशोक चौधरी को 26 सितंबर 2017 को केंद्रीय नेतृत्व ने पार्टी के अध्यक्ष पद से हटा दिया था. उसके बाद से अभी तक बिहार प्रदेश कांग्रेस को स्थायी अध्यक्ष नहीं मिला है. महागठबंधन टूटने के बाद बिहार में यह चर्चा जोर पकड़ी की पार्टी के अंदर टूट हो सकती है और कई विधायक जदयू के संपर्क में हैं. कयास लगाये गये पूर्व शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी नीतीश कुमार के काफी करीबी बन गये हैं और उनके नेतृत्व में पार्टी टूट सकती है. इन हलचलों के बीच पार्टी ने अशोक चौधरी को अध्यक्ष पद से हटा दिया. डॉ. अशोक चौधरी ने हटाने के इस तरीके का प्रतिवाद भी किया और दुखी मन से कहा था कि मैं पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के फैसले का स्वागत करता हूं. लेकिन जिस तरह मुझे पद से हटाया गया है, ऐसा मैंने कभी नहीं सोचा था. अगर उन्होंने मुझसे कहा होता, तो मैं खुद ही अपने इस्तीफे का प्रस्ताव रख देता. एक दलित, जिसकी दो पीढ़ियों ने बिहार कांग्रेस की तरक्की और मजबूती के लिए काम किया, उसे इतने अनौपचारिक तरीके से हटाना बहुत ही अपमानजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है. अपनी बात रखते हुए अशोक चौधरी काफी भावुक हो गए थे और एक बार के लिए तो वह कैमरे के सामने रो पड़े थे.

कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों की मानें, तो राहुल गांधी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद पुराने कांग्रेस नेताओं से हर राज्य के राजनीतिक और जातिगत समीकरण का फीडबैक ले रहे हैं. बिहार में अभी कौकब कादरी कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष ही बने रहेंगे. क्योंकि, राहुल गांधी को फीडबैक लेने में अभी देर हो रही है, वहीं दूसरी ओर कौकब विरोधी भी लगे हुए हैं कि वह अध्यक्ष न बन पाएं. हालांकि, कौकब कादरी ने अपनी सियासी कवायद को बढ़ा दी है और वह लगातार केंद्रीय नेतृत्व के संपर्क में बने हुए हैं. बिहार में किसी राजनीतिक घटना पर मीडिया में अपनी त्वरित प्रतिक्रिया देकर यह भी जताना चाहते हैं कि वह पूरी तरह सक्रिय हैं. हालांकि, गणतंत्र दिवस के मौके पर सदाकत आश्रम में उनकी मौजूदगी में पार्टी के नेता आपस-में हाथापाई पर उतर आये. कौकब विरोधियों ने इस घटना को नमक मिर्च लगाकर केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचा दिया और यह संदेश दे दिया कि बिहार कांग्रेस में सबकुछ ठीक-ठाक नहीं है.

दूसरी ओर राजनीतिक जानकारों की मानें, तो कांग्रेस में राहुल गांधी के कमान संभालने के बाद हर कदम फूंक-फूंक कर रखा जा रहा है. जोड़-तोड़ और जान-पहचान की राजनीति से ऊपर उठ कर फैसले लिये जा रहे हैं. हालांकि, पार्टी की ओर से अभी तक ऐसा कोई बड़ा फैसला नहीं लिया गया है, जिसमें पार्टी की अंदरूनी पारदर्शिता झलके. बताया जा रहा है कि राहुल गांधी की तलाश अभी भी बिहार में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए पूरी नहीं हुई है और पार्टी ऊर्जावान और विवादों से दूर रहने वाले नेता की तलाश में जुटी हुई है. कयास यह भी लगाया जा रहा है कि पार्टी बिहार में अपनी कमान किसी मुस्लिम युवा को सौंपने के ही मूड में है. कुछ लोग मानते हैं कि ऐसा नहीं है, फिलहाल कौकब कादरी यूं ही कार्यकारी अध्यक्ष बने रहेंगे, इनके स्थायी होने का चांस अभी नहीं है.

दूसरी ओर वरिष्ठ कांग्रेसी मानते हैं कि बिहार में मुस्लिम वोटों को साधने के लिए कांग्रेस पूरी तरह फूंक-फूंक कर कदम रख रही है, उसके यह मालूम है कि यदि बिहार में मुस्लिम वोटर उसके पक्ष में रहते हैं, तो भाजपा और नीतीश के खिलाफ कांग्रेस की स्थिति मजबूत होगी, वहीं दूसरी ओर पार्टी को राजद का पिछल्लू बन कर रहने की जरूरत नहीं पड़ेगी. पार्टी इसके लिए सीमांचल के विधायकों पर भी नजर बनाये हुए है. किशनगंज के विधायक डॉ. जावेद आजाद काफी ऊर्जावान और पढ़े लिखे युवा विधायक हैं. उनकी छवि भी बेदाग है, उनके स्व0 पिताजी केंद्र में मंत्री रहे हैं और वह पुराने जमाने से कांग्रेसी हैं. दूसरी ओर किशनगंज के ही बहादुरगंज विधायक तौसीफ आलम भी हैं, जिनकी पकड़ अपने इलाके में मजबूत मानी जाती है. राजनीतिक प्रेक्षकों की मानें, तो कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व बिहार में उसी नेता को स्थायी अध्यक्ष नियुक्त करेगा, जिसकी पकड़ पार्टी पर होने के साथ-साथ मुस्लिम और दलितों के साथ महादलित मतदाताओं पर भी हो. कांग्रेस को पता ही कि बिहार में पार्टी के मजबूती का फैक्टर जातिगत समीकरण से तय होता है और जो इस मानक पर खरा उतरेगा, उसे ही अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी जायेगी.

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