झारखंड हाईकोर्ट की बड़ी कार्रवाई: हिरासत में हुए मौत के 262 मामलों में फिर होगी न्यायिक जांच

Updated:
विज्ञापन
Jharkhand High Court

झारखंड हाईकोर्ट

Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने हिरासत में मौतों के मामले में राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए 2018 के बाद के 262 मामलों में फिर से न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं. अदालत ने इसे संवैधानिक दायित्व की विफलता करार दिया है. पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ें.

विज्ञापन

Jharkhand High Court, रांची (राणा प्रताप की रिपोर्ट): झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य में पुलिस और न्यायिक हिरासत में होने वाली मौतों के मामले में एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि हिरासत में मृत्यु, गायब होने या दुष्कर्म जैसे गंभीर मामलों की जांच कार्यपालक दंडाधिकारी (Executive Magistrate) नहीं, बल्कि न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate) द्वारा कराना अनिवार्य है. चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने 2018 के बाद के ऐसे 262 मामलों में दोबारा न्यायिक जांच कराने का आदेश दिया है, जिनमें पहले नियमों के विरुद्ध कार्यपालक जांच कराई गई थी.

कानून का शासन केवल कागजी अवधारणा न बने

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कानून के इस उल्लंघन को बर्दाश्त किया गया, तो न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास कमजोर होगा और ‘कानून का शासन’ केवल कागजी अवधारणा बनकर रह जाएगा. अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 176(1A) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 196(2) का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी जांच में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक अधिकारियों का होना अनिवार्य है, क्योंकि पुलिस और प्रशासनिक तंत्र के बीच ‘भाईचारे’ के संबंध निष्पक्ष जांच में बाधा बन सकते हैं.

Also Read: प्रभात खबर की खबर का असर: सीएम ने लिया संज्ञान, मेराल के संजयनगर में पहुंची राहत की बूंद

संविधान के अनुच्छेदों का उल्लंघन

कोर्ट ने राज्य सरकार की इस कार्यप्रणाली को एक ‘व्यवस्थित विफलता’ और संविधान के अनुच्छेद 14 व 21 का खुला उल्लंघन बताया है. खंडपीठ ने जोर देकर कहा कि लगभग दो दशक पहले कानून में हुए संशोधन के बावजूद राज्य सरकार ने इसकी अनदेखी की, जो प्रशासनिक विफलता की एक गंभीर तस्वीर पेश करती है.

कोर्ट द्वारा जारी किए गए सख्त निर्देश

खंडपीठ ने इस मामले में राज्य सरकार और संबंधित विभागों को कई कड़े निर्देश जारी किए हैं. उन्होंने कहा है कि वर्ष 2018 से अब तक के उन सभी 262 मामलों की सूची तैयार की जाए जिनमें कार्यपालक जांच हुई थी और अब उनकी नए सिरे से न्यायिक जांच कराई जाए. साथ ही उन्होंने प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा गृह विभाग के प्रधान सचिव को छह माह के भीतर रिपोर्ट देने को कहा है. उन्होंने सख्त सवाल पूछते हुए कहा कि अब तक न्यायिक जांच क्यों नहीं हुई और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों न की जाए. अदालत ने कहा कि यदि जांच के दौरान हिरासत में हिंसा या लापरवाही की पुष्टि होती है, तो पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने की प्रक्रिया स्वतः शुरू की जाए. इसके अलावा झारखंड जुडिशियल एकेडमी को अगले चार माह के भीतर जांच के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने का निर्देश दिया गया है. मुख्य सचिव और गृह विभाग को भी 30 दिनों के भीतर सभी जिलों के उपायुक्त (DC) और पुलिस अधीक्षक (SP) को इस संबंध में स्पष्ट निर्देश जारी करने को कहा गया है.

Also Read: चांडिल में पेट्रोल पंप संचालकों के साथ एसडीओ की बैठक, आवश्यक सेवाओं को प्राथमिकता देने का निर्देश

विज्ञापन
समीर उरांव

लेखक के बारे में

By समीर उरांव

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola