सामान्य वार्डों में इलाज कराने को मजबूर टीबी के मरीज, विभाग केवल जांच व दवा देने को जिम्मेदार

Updated at : 07 May 2024 9:35 PM (IST)
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जिला टीबी विभाग केवल जांच और दवा देने तक ही मरीजों के लिये जिम्मेदार बना है

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मुंगेर. एक ओर जहां सरकार द्वारा पूरे देश को टीबी मुक्त बनाने के लिये 2025 तक का लक्ष्य निर्धारित किया गया है और इसके लिये करोड़ों रुपये खर्च किये जा रहे हैं. वहीं मुंगेर जिले के सदर अस्पताल में टीबी के मरीजों को सामान्य वार्डों में इलाज कराना पड़ रहा है. जबकि जिला टीबी विभाग केवल जांच और दवा देने तक ही मरीजों के लिये जिम्मेदार बना है. हद तो यह है कि जनवरी से अप्रैल के बीच सदर अस्पताल में टीबी के कुल 24 मरीज इलाज के लिये भर्ती हो चुके हैं. जिसमें से कुछ मरीजों की मौत भी हो चुकी है. एक ओर जहां सदर अस्पताल में टीबी मरीजों के लिए बने जिला ड्रग रजिस्टेंट टीबी सेंटर में प्रतिरक्षण कार्यालय संचालित किया जा रहा है. वहीं टीबी के मरीज सदर अस्पताल में सामान्य वार्ड में इलाज कराने को मजबूर हैं. उन्हें केवल भर्ती कर दिया जाता है. जबकि दवा लेने भी यक्ष्मा केंद्र तक जाना होता है. हाल तो यह है कि यदि मरीज किसी अन्य गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं और उसे चिकित्सक द्वारा टीबी जांच लिखी गयी है तो भी उसे अपनी जांच के लिए यक्ष्मा केंद्र तक जाना पड़ता है. सदर अस्पताल में बीते चार माह की बात करें तो जनवरी से अप्रैल के बीच ट्यूबरक्लोसिस के कुल 24 मरीज इलाज के लिये भर्ती हुये हैं. जिसमें जनवरी माह में 4, फरवरी में 12, मार्च में 4 तथा अप्रैल में 4 मरीज भर्ती हुये हैं.

टीबी सेंटर में चल रहा प्रतिरक्षण कार्यालय

सदर अस्पताल के पुरुष वार्ड के समीप ही वर्षों पहले टीबी मरीजों के लिये जिला ड्रग रजिस्टेंट टीबी सेंटर बनाया गया था. लेकिन आज यहां प्रतिरक्षण कार्यालय संचालित किया जा रहा है. जबकि इससे पहले कोरोना काल के दौरान इसे कोविड वैक्सीनेशन सेंटर बना दिया गया था. जबकि कोरोना काल के बाद तो यह टीबी सेंटर महीनों तक यूं ही बंद पड़ा रहा. जहां अस्पताल का स्क्रैप रखा जा रहा था.

जिले में टीबी के हैं 2500 से अधिक मरीज

जिले में टीबी मरीजों का आंकड़ा भी काफी हैरान करने वाला है. जिले में टीबी के कुल 2,500 से अधिक मरीज वर्तमान में एक्टिव हैं. जिनके इलाज की जिम्मेदारी जिला यक्ष्मा विभाग पर है. हालांकि यक्ष्मा विभाग में केवल टीबी मरीजों के जांच और दवा देने की ही व्यवस्था है. हद तो यह है कि खुद विभाग को इस बात की जानकारी नहीं होती है कि सदर अस्पताल के वार्डों में कोई टीबी के मरीज इलाजरत हैं या नहीं. हद तो यह है कि जब भी यक्ष्मा दिवस आता है, तब ही विभाग द्वारा जागरूकता अभियान चलाया जाता है.

कहते हैं सिविल सर्जन

सिविल सर्जन डॉ विनोद कुमार सिन्हा ने बताया कि भवनों की कमी के कारण परेशानी हो रही है. मॉडल अस्पताल बनने के बाद मरीजों को परेशानी नहीं होगी. वहीं यदि मरीजों को दवा लेने यक्ष्मा केंद्र जाना पड़ता है तो इसकी व्यवस्था की जायेगी कि वार्ड में भर्ती मरीजों को वहां दवा लेने न जाना पड़े.

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