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वोट ओकरे, जे करतै विकास

Updated at : 06 Oct 2015 3:17 AM (IST)
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वोट ओकरे, जे करतै विकास

चुनाव के दौरान हर क्षेत्र में एक परिदृश्य समान रूप से दिखता है. अधूरी परियोजनाएं, विकास के सवाल और आम लोगों की जिंदगी से जुड़े मुद्दे प्रमुखता से उभरते हैं. प्रत्याशी भले ही जातिगत समीकरण पर भरोसा करें, लेकिन आम लोगों की आकाक्षाएं तो इससे इतर होती हैं. इस चुनाव में भी पूर्वी बिहार के […]

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चुनाव के दौरान हर क्षेत्र में एक परिदृश्य समान रूप से दिखता है. अधूरी परियोजनाएं, विकास के सवाल और आम लोगों की जिंदगी से जुड़े मुद्दे प्रमुखता से उभरते हैं. प्रत्याशी भले ही जातिगत समीकरण पर भरोसा करें, लेकिन आम लोगों की आकाक्षाएं तो इससे इतर होती हैं. इस चुनाव में भी पूर्वी बिहार के पुराना जिले मुंगेर और उत्तर बिहार के शिवहर, जो राज्य का सबसे छोटा जिला है, में भी कुछ ऐसा ही परिदृश्य दिख रहा है. चुनावी माहौल की चर्चा के क्रम में आज मुंगेर और शिवहर जिले की रिपोर्ट.
भागलपुर कार्यालय
मुंगेर ने राजनीति के कई रंग देखे हैं. कभी यह समाजवादियों का गढ़ था. लेकिन बाद के दिनों में परिदृश्य बदला और झंडों का रंग बदलता रहा. राजनीतिक रूप से जागरूक मुंगेर एक बार फिर चुनाव के लिए तैयार है. यहां विधानसभा की तीन सीटें हैं और प्रथम चरण में 12 अक्तूबर को मतदान होना है.
मतदाता जात-पात की राजनीति से ऊब चुके हैं और उन्हें विकास की चिंता है. नेताओं का दौरा ताबड़तोड़ हो रहा है, लेकिन मतदाता खामोश हैं. उनकी नब्ज को पकड़ना आसान नहीं. चुनाव की चर्चा शुरू होते ही युवा जहां रोजगार की बात करते हैं, वहीं आम लोग विकास के मुद्दे पर तल्ख टिप्पणी करने लगते हैं.
कहां है रोजगार का इंतजाम
नौवागढ़ी बाजार में मिले शिवराज चौधरी से राजनीति के बारे में बातें होती हैं. चिंता के साथ शुरू हुए – राजनीति आज बहुत गंदी हो गयी है. जात-धर्म के नाम पर नेता वोट मांग रहे हैं. लोगों को तो रोजगार चाहिए. मुंगेर जिले में रोजगार का कोई साधन उपलब्ध ही नहीं है. उनके बगल में बैठे घनश्याम मंडल ने तपाक से कहा कि विकास से किसी नेता को कोई वास्ता नहीं. एक नेताजी ने नौवागढ़ी मैदान में कहा था कि उनकी सरकार बनी, तो नौवागढ़ी को प्रखंड बनायेंगे, लेकिन क्या हुआ? नौवागढ़ी वहीं ठहरा हुआ है, जहां पांच-सात साल पहले था.
आगे बढ़ने पर शीतलपुर चौक पर एक चाय दुकान पर बैठकी जमी थी. बैठकी में थे कुछ युवा व ज्यादातर बुजुर्ग लोग. चर्चा चुनाव पर हो रही है. शीतलपुर के बंटी कुमार ने चाय की चुस्की के साथ कहा कि जनता की सोच बदली है और लोग विकास चाहते हैं. युवा अपना बेहतर भविष्य देख रहा है. वहीं बैठे मिले अमित कुमार. वह एमबीए की डिग्री लेकर घर बैठे हुए हैं.
मुंगेर में उनके लिए रोजगार का अवसर नहीं है. मो जहांगीर बीच में हस्तक्षेप करते हैं – बिहार में विकास हो रहा है. सड़क, स्वास्थ्य के क्षेत्र में बदलाव साफ दिख रहा है. पहले अस्पताल में डॉक्टर नहीं मिलते थे. अब डॉक्टर के साथ दवा भी मिलती है. नित्यानंद यादव भी हामी भरते हैं- नंदलालपुर में आइटीसी का डेयरी प्रोजेक्ट बन रहा है, जिससे इस क्षेत्र में दूध का बड़ा कारोबार होगा. लोगों को रोजगार मिलेगा.
जनता की बदली सोच
बरियारपुर होते हुए जब हवेली खड़गपुर पहुंचे, तो छात्र सौरभ आर्य से मुलाकात हुई.उसने कहा, ‘वोट तो ओकरे देबै, जे विकास रॉ बात करतै. हियां अखनी की छै? एकटा डिग्री कौलेज, मतुर पढ़ावै लेली प्राध्यापके नै.’ कोचिंग के सामने खड़ी बीएम की छात्र पुष्पा कुमारी कहती है, ‘अहो, खड़गपुर अनुमंडल छै, मतुर नै तॅ गल्र्स हाइ स्कूल छै, नै महिला कौलेज. आखिर लड़की सनी केना केॅ पढ़तै?’ ममता, स्नेहा, रानी और सोनाक्षी की राय इससे अलग थी.
सरकार से उन्हें साइकिल मिली है. इसी की बदौलत गांव से चल कर पढ़ने शहर आ पाती हैं. तारापुर के युवा व्यवसायी पप्पू केसरी वर्तमान राजनीति से निराश हैं. कहते हैं, ‘राजनीतिक की क्या बात करें? जनता से किसी का सरोकार नहीं है. सभी नेता परिवारवाद और जातिवाद की बात करते हैं, मगर इस बार लोगों की सोच थोड़ी बदली है. जो विकास करेगा, वही वोट पायेगा. वहीं चाय दुकानदार गणोश कुशवाहा मिले. बिना लाग-लपेट के कहते हैं ,‘की फरक पडै छै, केकरो जीत हुवै?’
चिंतित हैं किसान
जमालपुर विधानसभा क्षेत्र के धरहरा टाल क्षेत्र में किसान खेतों में पानी पटाते मिले. चुनाव पर चर्चा शुरू हुई, तो वह पहले कतराये. फिर कहा, ‘खेत क्या पटावें? पानिये नहीं हैं. डकरानाला परियोजना तो हाथी का दांत है.
सतघरवा जलाशय भी बेकारे है.’ पटवन कैसे होगा. आगे बढ़े, तो भलार गांव के किसान मनोज सिंह मिले. बोले, ‘नेता लोग को किसान की चिंता है? फसल जल रही है. डीजल अनुदान अभी तब नहीं मिला.’ नक्सल प्रभावित बंगलवा में संतोष कोड़ा, मन्नू कोड़ा और दिलीप कोड़ा एक गाछ के नीचे बैठे मिले. बगल से एक चुनाव वाहन गुजरा. एक ने कहा, ‘रोजी-रोजगार मिलवे नहीं करता है. ई नेता सब को वोट चाहिए!
(इनपुट – मुंगेर से राणा गौरीशंकर)
आठ साल से घोरघट पुल टूटा : एनएच पर घोरघट पुल आठ वर्षों से टूटा हुआ है. मुंगेर-भागलपुर के बीच बड़ी गाड़ियों का आना-जाना नहीं होता. मुंगेर के युवा व्यवसायी देव कुमार ने कहा कि शहर टापू बन गया है. ट्रक से सामान लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी होती ती है. इससे लागत बढ़ जाती है.गंगा पुल कब चालू होगा, इसका इंतजार है.
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