Motihari : पूर्वी चंपारण की दो लाख जीविका दीदियां चला रहीं हैं 277 करोड़ की अर्थव्यवस्था

Published by : INTEJARUL HAQ Updated At : 07 Dec 2025 5:07 PM

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कभी गरीबी व मुफलिसी की जीवन जीने वाली महिलाएं अब जीविका दीदी बन ग्रामीण अर्थ व्यवस्था की रीढ़ बन गयी हैं.

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पेज वन के लिए ध्यानार्थ- -98 प्रतिशत रिपेमेंट के साथ बढ़ रहीं जीविकोपार्जन की ओर -27 प्रखंडों के सभी पंचायतों में बनीं आकर्षण का खास केन्द्र -आत्मसम्मन व आर्थिक शक्ति की कहानी गढ़ रहीं महिलाएं इन्तेजारूल हक-प्रतिनिधि- मोतिहारी . कभी गरीबी व मुफलिसी की जीवन जीने वाली महिलाएं अब जीविका दीदी बन ग्रामीण अर्थ व्यवस्था की रीढ़ बन गयी हैं.स्वयं सहायता समूहों यानी एसएचजी के माध्यम से वित्तीय समावेशन, महिला सशक्तिकरण और आजीविका सृजन में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा आत्मसम्मान व आर्थिक शक्ति की कहानी गढ़ी रही हैं. ,जीविका परियोजना कार्यालय से प्राप्त आंकड़ों व तथ्यों के अनुसार,जिले की 26325 समूहों की 2,10600 महिलाओं को जिले के विभिन्न बैंकों से इस साल अबतक 277 करोड़ रूपये का ऋण दिया गया. दिये गये ऋण से दीदियों ने पशुपालन खेती,किराना दुकान आदि व्यवसाय की शुरूआत की और अपने रोजमर्ररा की जरूरतों को पूरा करते हुए 98 प्रतिशत ऋण की वापसी कर दी. ये सभी वे महिलाएं हैं जो कभी नौकरी नहीं की और बदहाल व बदतर जीवन जी रहीं थीं.अब आर्थिक व सामाजिक सशक्तिकरण के लिए जानी जा रही हैं. 27 प्रखंडों के सभी पंचायतों में इनकी पहुंच देखी व समझी जा रही है. 2006 में योजना की हुई थी शुरुआत जानकार बताते हैं कि साल-2006 में एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर जीविका योजना की शुरूाआत हुई थी और अब यह योजना महिलाओं के लिए एक शांत क्रांति का प्रतीक बन गयी है. महिलाओं के लिए यह कोई राहत योजना नहीं ,बल्कि आत्म-सम्मान,आर्थिक शक्ति और सामूहिक भरोसे की कहानी है.संकट से जन्मी, समय के साथ ताकत बन गयी है. समूहों पर बैंकों का पूरा भरोसा, आसानी से मिलता है लोन जीविका दीदियों व समृहों पर बैंकों का इतना भरोसा है कि बिना कोई गारंटी के लोन मिल जाता है. महिला एसएसजी की बैठक में आती है और राशि मांगने के साथ मंजूरी मिल जाती है. बैंक इनसे केवल आधार कार्ड व पैन कार्ड लेती है और हस्ताक्षर करा कर्ज दे देती है. क्योंकि समूह को उस पर भरोसा है. महिलाएं इसे सरकार का पैसा नहीं, अपने समूह की पूंजी मानती हैं, और उसे बचाती हैं. दीदी की रसोई और बैंक सखी जैसी पहलें भी काबिल-ए-तारीफ दीदी की रसोई जीविका दीदियों द्वारा चलाई जा रही कैंटीन हैं जो अस्पतालों और सरकारी संस्थानों में सस्ती और पोषणयुक्त खाना परोसती हैं. वहीं बैंक सखी गांवों में जाकर लोगों को बैंकिंग सेवाएं देती हैं.अभी सदर अस्पताल व समाहरणालय सहित कई इलाकों में दीदी की रसोई चल रही है जहां लोग शौक से सस्ते दर पर खाना खाते दिखते हैं. पीएमजेजेबीवाई व पीएमएसबीवाई योजना का भी ले रहीं लाभ दीदियां और आगे बढ़ पीएमजेजेबीवाई व पीएमएसबीवाई जैसी योजनाओं से भी जुड़ रही हैं और गांवों के लोगों को लाभान्वित कर रही हैं. विभागीय अधिकारियों के निर्देश्न में पूरी सक्रीयता दिखा रही हैं और उसका सकारात्मक प्रभाव में गांवों में जाने पर दिखने को मिल रहा है. कहते हैं अधिकारी -जीविका दीदियां अभी हर क्षेत्र में अच्छा कर रही हैं. सरकार जिस सोंच के साथ योजनाएं दे रही है,उसे पूरा कर रही हैं. गणेश पासवान- डीपीएम,जीविका परियोजना

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