कोयला उत्पादन की अंधी दौड़ में उजड़ रहे जंगल, टंडवा-केरेडारी से गायब होती हरियाली
Published by : KumarVishwat Sen Updated At : 27 May 2026 3:49 PM
टंडवा का चंद्रगुप्त कोलियरी. फोटो: प्रभात खबर
Chatra News: चतरा के टंडवा-केरेडारी क्षेत्र में कोयला उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर जंगल उजाड़े जा रहे हैं. आम्रपाली, चंद्रगुप्त और मगध परियोजनाओं के कारण हरियाली खत्म हो रही है. ग्रामीणों ने पर्यावरण संरक्षण, पुनर्वास और पौधरोपण के नियमों के पालन की मांग उठायी है. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.
चतरा से दीनबंधू की रिपोर्ट
Chatra News: चतरा जिले के टंडवा और केरेडारी क्षेत्र में तेजी से हो रहे कोयला उत्पादन ने प्राकृतिक हरियाली को निगलना शुरू कर दिया है. कभी घने जंगलों और हरियाली के लिए पहचान रखने वाला यह इलाका अब धीरे-धीरे काली धूल और उजड़े पहाड़ों में तब्दील होता जा रहा है. स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस कोयले को बनने में हजारों साल लगे, उसे कुछ ही वर्षों में तेजी से निकाल लिया गया और अब भी बड़े पैमाने पर खनन जारी है. करीब ढाई लाख आबादी वाले टंडवा-केरेडारी क्षेत्र में जंगलों की कटाई और पर्यावरणीय नुकसान को लेकर लोगों में चिंता बढ़ती जा रही है. ग्रामीणों का आरोप है कि खनन कंपनियां और सीसीएल उत्पादन बढ़ाने में लगी हैं, लेकिन पर्यावरण संरक्षण और पुनर्वास के नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है.
हजारों हेक्टेयर जंगल खनन कंपनियों को सौंपे गये
जानकारी के अनुसार, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने अलग-अलग परियोजनाओं के लिए बड़ी मात्रा में वन भूमि खनन कंपनियों को सौंप दी है. आम्रपाली परियोजना के लिए करीब 850 हेक्टेयर जंगल सीसीएल को दिया गया है. इसी प्रकार चंद्रगुप्त परियोजना के लिए 650 हेक्टेयर तथा मगध परियोजना के लिए 192 हेक्टेयर वन भूमि आवंटित की गयी है. स्थानीय लोगों का कहना है कि जंगलों को जिस तेजी से काटा गया, उस अनुपात में न तो पौधरोपण हुआ और न ही वन संरक्षण पर गंभीरता दिखाई गयी. गांवों के आसपास अब हरियाली की जगह कोयले की धूल और प्रदूषण फैलता जा रहा है. लोगों का आरोप है कि जंगलों की वनस्पतियां भगवान भरोसे छोड़ दी गयी हैं.
दो हजार हेक्टेयर और जंगल लेने की तैयारी
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार टंडवा, केरेडारी और बालूमाथ क्षेत्र में लगभग दो हजार हेक्टेयर अतिरिक्त वन भूमि के लिए भी सीसीएल अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने की कोशिश में है. इससे स्थानीय लोगों की चिंता और बढ़ गयी है. नियमों के अनुसार जितने पेड़ काटे जाते हैं, उसके बदले दोगुने पेड़ लगाने और उनके संरक्षण की जिम्मेदारी खनन कंपनियों की होती है. साथ ही जिस भूमि से कोयला निकाल लिया जाता है, वहां ओबी भरकर दोबारा हरियाली विकसित करने का प्रावधान है. लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन नियमों का जमीनी स्तर पर सही तरीके से पालन नहीं हो रहा.
विधायक प्रतिनिधि ने उठाये सवाल
इस मुद्दे पर विधायक प्रतिनिधि बिनय सिंह ने खनन कंपनियों और प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े किये हैं. उनका कहना है कि केंद्र सरकार ने जिन शर्तों के साथ जंगलों से कोयला उत्पादन की अनुमति दी थी, उनका अनुपालन टंडवा-केरेडारी क्षेत्र में लगभग नहीं के बराबर हो रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि जंगलों के आसपास रहने वाले परिवारों को न तो पुनर्वास का लाभ मिल रहा है और न ही उन्हें व्यवस्थित तरीके से दूसरी जगह बसाने की पहल हो रही है. खासकर मगध परियोजना के देवलगड़ा क्षेत्र में रहने वाले करीब 600 आदिवासी परिवार आज भी विस्थापन की अनिश्चितता के बीच जीवन गुजार रहे हैं.
उत्पादन बढ़ा, लेकिन पर्यावरण संरक्षण पीछे
बताया जा रहा है कि आम्रपाली और चंद्रगुप्त परियोजना में प्रतिदिन 80 हजार टन से अधिक कोयला उत्पादन हो रहा है, जबकि मगध परियोजना में करीब 50 हजार टन कोयला निकाला जा रहा है. उत्पादन के इस बढ़ते दबाव का सीधा असर जंगलों और पर्यावरण पर पड़ रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि जिन क्षेत्रों से कोयला निकाला जा रहा है, वहां पर्यावरण संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है. पेड़ों की कटाई से तापमान बढ़ रहा है, जल स्रोत प्रभावित हो रहे हैं और गांवों में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है. कई गांवों में कोयले की धूल घरों तक पहुंच रही है, जिससे लोगों को सांस और त्वचा संबंधी समस्याएं भी होने लगी हैं.
गांवों से दूर हो रहा पौधरोपण
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जहां जंगल काटे जा रहे हैं, वहां पौधरोपण नहीं किया जा रहा. बल्कि वन विभाग को राशि देकर 50 किलोमीटर दूर दूसरे क्षेत्रों में पेड़ लगाये जा रहे हैं. इससे स्थानीय इलाके में हरियाली वापस नहीं लौट पा रही है. इस मामले में टंडवा के रेंजर मुक्ति प्रकाश पन्ना का कहना है कि टंडवा-केरेडारी क्षेत्र में पर्याप्त भूमि नहीं मिलने के कारण दूसरे स्थानों पर पौधरोपण कराया जा रहा है. वहीं आम्रपाली परियोजना के पीओ सतेंद्र सिंह ने कहा कि पेड़ लगाने और संरक्षण के लिए सीसीएल द्वारा वन विभाग को राशि उपलब्ध करा दी जाती है.
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हरियाली की जगह फैल रही कोयले की काली परत
खनन परियोजनाओं के विस्तार के साथ अब गांवों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. कभी पेड़ों और जंगलों से घिरे रहने वाले गांव अब काली धूल से ढकते जा रहे हैं. लोगों का कहना है कि जंगल खत्म होने से वन्य जीवों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है और पर्यावरण असंतुलन लगातार बढ़ रहा है. ग्रामीणों ने मांग की है कि खनन कार्य के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण, पुनर्वास और पौधरोपण के नियमों का सख्ती से पालन कराया जाये. लोगों का कहना है कि यदि समय रहते जंगलों को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाये गये, तो आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ उजड़े पहाड़ और प्रदूषण ही विरासत में मिलेगा.
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By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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