पवित्र धौंस नदी का पानी हो गया काला

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 17 Apr 2016 7:16 AM

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पीने में होता था उपयोग, अब छूने से परहेज मधुबनी : हिमालय के गोद से निकलने वाली पवित्र धौंस नदी का पानी कभी लोगोें के पीने के काम आता था, सिंचाई व अन्य कामों में इसकी उपयोगिता की कौन कहे. पर आज यह पवित्र नदी के पानी को कोई छूना भी पसंद नहीं करता. मानों […]

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पीने में होता था उपयोग, अब छूने से परहेज

मधुबनी : हिमालय के गोद से निकलने वाली पवित्र धौंस नदी का पानी कभी लोगोें के पीने के काम आता था, सिंचाई व अन्य कामों में इसकी उपयोगिता की कौन कहे. पर आज यह पवित्र नदी के पानी को कोई छूना भी पसंद नहीं करता. मानों यह नदी अभिशप्त हो गया है. इसकी पवित्र पानी में मानों तेजाब डाल दिया गया हो. दरअसल पड़ोसी मित्र राष्ट्र नेपाल के महेंद्र नगर स्थित एक निजी पेपर मिल से छोड़े गये गंदा पानी के कारण इतना प्रदूषित हो चुका है कि अब तो लोगों को इस पानी से डर लगा रहता है. हर कोई इस पानी से बचने की जुगत में रहते हैं.
लहलहाती थी फसल
किसी जमाने में यह नदी अपने किनारे बसे गांव की आबादी के लिए वरदान था. किसानों के खेत इस नदी की पानी के पटवन से तीनों फसलों के समय लहलहाते रहते थे. चापाकल की संख्या नगण्य रहने के कारण मानव और पशु दोनों के स्नान के लिए इसकी प्रमुखता तो थी ही धार्मिक अनुष्ठानों में इसी जल से पूजा,
पाठ, प्रसाद सामग्री आदि भी बनाये जाते थे. इस नदी के पानी को लगभग दो सौ किलोमीटर की दूरी में किनारे बसे सैकड़ों गांव के हजारों लोग शुद्ध एवं पवित्र जल समझकर इसका सेवन किया करते थे. खेत में काम करने वाले किसान और मजदूर जलपान के बाद इसी नदी का पानी पीते थे. किसानों को पीने के पानी घर से अपने या मजदूर के लिए नहीं ले जाना पड़ता था.
नहीं निकला हल: धौंस नदी में एक निजी पेपर मील के प्रबंधन द्वारा वर्षों से गंदा पानी बहाने और इससे इसके किनारे बसे लोग पशु, भूमि और फसलों में उत्पन्न होने वाली कठिनाई इन वर्षों में सुर्खिया में रहा. पर सरकारी या प्रशासनिक स्तर पर
इसके निदान की कोई ठोस पहल अब तक नहीं की जा सकी है. धौंस किनारे बसे क्षेत्र के लोगों के साथ विभिन्न राजनीतिक दल एवं स्वयं सेवी संगठन के लोग वर्षों से इस समस्या को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से कई आंदोलन भी चलाये और नीचे से ऊपर तक के अधिकारियों, राज्य एवं केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय, पर्यावरण व विदेश मंत्रालय को व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर लिख चुके हैं, पर ये सभी प्रयास नाकाम साबित
हो रहा है.
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