रोटी की तलाश में पलायन कर रहे हैं युवा

Published at :29 Nov 2015 7:10 PM (IST)
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रोटी की तलाश में पलायन कर रहे हैं युवा

रोटी की तलाश में पलायन कर रहे हैं युवा फोट:::::नहीं हैं.-चिंताजनक . संभावनाओं के बावजूद एक भी उद्योग नहीं हो सका स्थापित -तीन प्रखंडों के लोग बाढ़ की विभीषिका से त्रस्त होते रहे हैं प्रतिनिधि, उदाकिशुनगंज बाढ़ व सुखाड़ की पीड़ा झेल रहे अनुमंडल वासी को आज तक एक भी उद्योग नसीब नहीं हो सका. […]

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रोटी की तलाश में पलायन कर रहे हैं युवा फोट:::::नहीं हैं.-चिंताजनक . संभावनाओं के बावजूद एक भी उद्योग नहीं हो सका स्थापित -तीन प्रखंडों के लोग बाढ़ की विभीषिका से त्रस्त होते रहे हैं प्रतिनिधि, उदाकिशुनगंज बाढ़ व सुखाड़ की पीड़ा झेल रहे अनुमंडल वासी को आज तक एक भी उद्योग नसीब नहीं हो सका. जिसके कारण बड़ी संख्या में युवा बेरोजगार रोजी-रोटी की तलाश में दूसरे प्रदेश पलायन करते रहे हैं. इस अनुमंडल के तीन तीन विधायक उद्योग मंत्री के पद पर रह चुके है. हर वर्ष आने वाली बाढ़ से अनुमंडल के तीन प्रखंडों के लोग बाढ़ की विभीषिका से त्रस्त होते रहे हैं. जबकि सुखाड़ की काली छाया अनुमंडल वासी पर पड़ते रहने से आर्थिक रूप से काफी कमजोर होते गये है. जिससे आर्थिक संरचना बिगड़ती जा रही है. बावजूद इसके भी सरकार ठोस रणनीति बना कर अनुमंडल का सम्यक विकास कर सकती है और आर्थिक ढ़ांचा को समृद्धि किया जा सकता है. मक्का व आलू पर आधारित प्रसंस्करण उद्योग का अभाव उदाकिशुनगंज-बिहारीगंज, पुरैनी, ग्वालपाड़ा प्रखंड में आलू की खेती अधिकतर किसान किया करते है. अनुमंडल के सभी छह प्रखंडों में मक्का फसल की खेती बहुतायत मात्रा में की जाती है. किंतु अनुमंडल मुख्यालय में एक कोल्ड स्टोर आलू रखने में अपर्याप्त है. हालांकि, उसका भी व्यवस्था सही नहीं है. जिसके कारण आलू उत्पादक किसानों को कम कीमत पर स्थानीय व्यापारियों को बेचना मजबूरी बन जाता है. कभी – कभी लागत खर्च भी उपर नहीं हो पाता है. ऐसी स्थिति मक्का उत्पादक किसानों की है. यहां मक्का की खेती अधिक होने के बावजूद भी एक भी उद्योग स्थापित नहीं किया जा सका है. मक्का तैयार होने के बाद लोकल व्यापारियों के पास कम कीमत पर बेचना किसानों की मजबूरी बन जाती है. यहां का मक्का देश के अन्य राज्यों के अलावे पड़ोसी देश नेपाल व बंगलादेश तक भेजा जाता है. जिससे व्यापारियों को तो अच्छी आमदनी हो जाती है. लेकिन किसानों को वाजिब कीमत प्राप्त करने से वंचित होना पड़ता है. अगर मक्का व आलू आधारित उद्योग स्थापित किया जाय तो किसानों को काफी लाभ मिल सकता है. हस्तकरघा उद्योग को देना होगा बढ़ावा उदाकिशुनगंज प्रखंड के तेलडीहा, तीरासी, मंजौरा, रामपुर डेहरू, रहुआ, कुमारपुर, पुरैनी प्रखंड के नरदह कोठी, चौसा प्रखंड के घोषई गांव में लगभग 14 सौ हस्तकरघा पूर्व में चला करता था. किंतु सूत व रूई के अभाव में सभी हस्तकरघा बंद हो गया. जबकि यहां निर्मित धोती, चादर, गमछा, बेडसीट, कुर्ता व पैजामा, का वस्त्र देश के अन्य राज्यों में काफी पंसद किया जाता था. हालांकि बुनकरों के बीच आस तब जगी थी जब खादी आयोग 17 करोड़ रूपये की लागत से प्रमंडल मुख्यालय सहरसा में पुनी प्लांट स्थापित करने का निर्णय लिया था. लेकिन वो भी चालू नहीं हो सका. इस तरह सभी बुनकरों का हाथ बेकार हो गया है. अगर राज्य सरकार चाहें तो इसे पूर्नविहित किया जा सकता है. गन्ना आधारित उद्योग लगता तो लोग होते समृद्ध अनुमंडल क्षेत्र में लगभग 14 सौ एक से भी अधिक खेतों में गन्ना की खेती की जाती है. चीनी मिल नहीं रखने के कारण छोटे – छोटे गुर मिल व एक चीनी मिल मालिक के शोषण का शिकार किसान होते रहे है. कम कीमत पर मिल मालिकों को गन्ना देने पर भी तत्काल राशि का भुगतान नहीं किया जाता है. मूल्य भुगतान करने में मिल मालिक अधिक समय लगा देते है. किंतु सरकारी पहल पर मध्य प्रदेश के धानपुर चीनी मिल मालिक यहां चीनी मिल स्थापना करने के लिए आगे भी आये तो स्थानीय कुछ किसानों ने भूमि अधिग्रहण में अड़ंगा लगा दिया. जिसके कारण चीनी मिल की स्थापना नहीं की जा सकी. अगर चीनी मिल का स्थापना हो जाता तो किसानों को उचित मूल्य मिल पाता. इतना ही नहीं मिल प्रबंधन द्वारा उत्तम किस्म का गन्ना का बीच उपलब्ध करवाया जाता. किसानों को गन्ना की खेती करने के लिए प्रशिक्षण भी दिया जाता. मिल प्रबंधन का उदेश्य था कि गन्ना के रस निकले गाद से बिजली का भी उत्पादन किया जाता. जिस बिजली की सप्लाई कम कीमत पर स्थानीय लोगों को उपलब्ध करवाया जाता. इथनॉल का भी उत्पादन करने का लक्ष्य था. उत्तम क्वालिटी का स्कूल खोलने का भी लक्ष्य था. लेकिन कुछ भी नहीं हो सका. जिससे किसानों में निराशा छा गयी. मत्स्य पालन से बदल सकती थी सूरत अनुमंडल क्षेत्र के मछलियां सबसे अधिक स्वादिष्ट मानी जाती है. इस क्षेत्र में तालाब व गहरे जमीन में सालों भर पानी जमा रहता है. जिससे मछली पालन को बढ़ावा दिया जा सकता है. अगर सरकारी स्तर पर हेचरी की सुविधा अगर सरकारी स्तर पर उपलब्ध कराया जाता है तो मछली उत्पादन को बढ़ावा मिल सकता है. आर्थिक विपन्नता के कारण मत्स्य पालक अपेक्षा अनुसार मछली का पालन नहीं कर पाते है. मछवारों को उचित प्रशिक्षण भी नहीं दिया जाता है. अगर सरकार मछली पालन के क्षेत्र में सरकार आर्थिक मदद करें तो यहां के मछली पालक आंध्रप्रदेश को भी पीछा छोड़ सकता है. इस तरह देखा जाय तो उद्योग लगाने के लिए सरकारी स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं किया जा सका है. जबकि अनुमंडल के विधायक विरेंद्र कुमार सिंह, डा रविंद्र चरण यादव, डा रेणु कुशवाहा उद्योग मंत्री के पद पर रह चुके है. फिर भी एक भी उद्योग की स्थापना नहीं की जा सकी है.

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