लैंड फॉर जॉब मामले में लालू परिवार को झटका, सुप्रीम कोर्ट ने FIR रद्द करने की अपील खारिज की

लालू प्रसाद यावद
Land For Job Scam: बिहार के चर्चित लैंड फॉर जॉब स्कैम ’ मामले में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यावद को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है. कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने और परिवार के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की थी. इस फैसले के बाद अब मामले की सुनवाई निचली अदालत में जारी रहेगी.
Land For Job Scam: लैंड फॉर जॉब स्कैम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लालू यादव की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने और अपने परिवार के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की गुहार लगाई थी.
अदालत के इस फैसले के बाद अब लालू परिवार पर कानूनी शिकंजा और कसता नजर आ रहा है. कोर्ट ने इस झटके के बीच लालू यादव को एक छोटी सी राहत भी दी है.
क्रिमिनल एंटरप्राइज की तरह हुआ काम?
जस्टिस एमएम सुंदरेश और एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि इस मामले में FIR को रद्द नहीं किया जा सकता. फैसला ऐसे समय में आया है जब दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट पहले ही लालू यादव समेत 41 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय कर चुकी है.
कोर्ट के इस फैसले से साफ है कि अब लालू यादव और अन्य आरोपियों को ट्रायल फेस करना होगा. निचली अदालत ने अपनी टिप्पणी में यहां तक कहा था कि इस पूरे घोटाले को एक ‘क्रिमिनल एंटरप्राइज’ की तरह अंजाम दिया गया.
अदालत में पेशी से मिली छूट
भले ही FIR रद्द करने की मुख्य मांग ठुकरा दी गई हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने लालू यादव की सेहत और उम्र का ख्याल रखते हुए उन्हें एक विशेष रियायत दी है. बेंच ने आदेश दिया है कि सुनवाई के दौरान लालू प्रसाद यादव को निचली अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने की आवश्यकता नहीं होगी.
उनके वकील कोर्ट में उनका पक्ष रख सकेंगे.उन्हें बार-बार कोर्ट के चक्कर लगाने से मुक्ति मिल गई है, लेकिन केस की मेरिट पर उन्हें अब भी अपनी बेगुनाही साबित करनी होगी.
क्या है लैंड फॉर जॉब घोटाला?
यह मामला उस समय का है जब लालू प्रसाद यादव केंद्र में रेल मंत्री थे. आरोप है कि रेलवे में ग्रुप-डी के पदों पर नियुक्तियों के बदले उम्मीदवारों और उनके परिवारों से बेहद कम कीमतों पर जमीनें लिखवाई गईं. सीबीआई (CBI) का दावा है कि ये जमीनें लालू यादव के परिवार के सदस्यों और उनके स्वामित्व वाली कंपनी के नाम पर ट्रांसफर की गई थीं.
अब जब सुप्रीम कोर्ट ने जांच को हरी झंडी दे दी है, तो आने वाले दिनों में बिहार की सियासत में इस मुद्दे पर गरमागरम बहस और तेज होने की उम्मीद है.
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लेखक के बारे में
By Pratyush Prashant
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.
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