बरसात में इलाज की जगह तैराकी करनी पड़े स्वास्थ्य उपकेंद्र पहुंचने के लिए

Published by : Rajeev Murarai Sinha Sinha Updated At : 10 Feb 2026 10:02 PM

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सरकार भले ही स्वास्थ्य को हर नागरिक का अधिकार बताती हो, लेकिन लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा प्रखंड अंतर्गत लय गांव में यह अधिकार आज भी रास्ता तलाश रहा है.

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विडंबना. 32 लाख का स्वास्थ्य उपकेंद्र बना “बीमार भवन”

रास्ता ही नहीं, इलाज क्या हो, जंगल और पानी में कैद लय गांव का सरकारी स्वास्थ्य केंद्र

सूर्यगढ़ा. सरकार भले ही स्वास्थ्य को हर नागरिक का अधिकार बताती हो, लेकिन लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा प्रखंड अंतर्गत लय गांव में यह अधिकार आज भी रास्ता तलाश रहा है. वर्ष 2023 में विशेष केंद्रीय सहायता राशि से 32 लाख 13 हजार 158 रुपये की लागत से निर्मित स्वास्थ्य उपकेंद्र आज जंगल और पानी के बीच घिरा हुआ खड़ा है, मानो खुद बीमार हो. सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब उपकेंद्र तक पहुंचने का रास्ता ही नहीं, तो भवन का निर्माण आखिर क्यों किया गया. जिस स्थान पर यह भवन बनाया गया है, वहां तक जाने के लिए कोई अप्रोच पथ उपलब्ध नहीं है. चारों ओर पानी और गड्ढों के कारण वर्ष के केवल दो-तीन सूखे महीनों में ही वहां पहुंच संभव है. बरसात में तो इलाज की जगह तैराकी करनी पड़े, ऐसी स्थिति है.

भवन की हालत खुद इसकी दुर्दशा की कहानी कहती है. एक ओर की बाउंड्री पूरी तरह गिर चुका है, पूरा परिसर जंगल में तब्दील हो गया है और मुख्य भवन पर आज तक ताला लटका हुआ है. सवाल यह उठता है कि क्या यह स्वास्थ्य उपकेंद्र मरीजों के लिए बना था या सिर्फ कागजी औपचारिकता के लिए.

विडंबना यह है कि कागजों में उपकेंद्र तैयार दर्शाया जा रहा है, जबकि वास्तविकता में स्वास्थ्य सेवाएं गांव के एक निजी भवन में संचालित की जा रही हैं. यानी सरकार ने लाखों रुपये खर्च कर भवन तो बना दिया, लेकिन उसका कोई व्यावहारिक लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल रहा. इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला बयान सूर्यगढ़ा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी वाईके दिवाकर का है. उन्होंने कहा कि उन्हें न तो उपकेंद्र के निर्माण की जानकारी है और न ही लागत व प्रक्रिया की. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वर्ष 2023 में संवेदक द्वारा उनके जाली-फर्जी हस्ताक्षर कर विभाग को दस्तावेज सौंपे गये, जिसका उन्हें कोई पूर्ण जानकारी नहीं थी.

भवन निर्माण पर उठ रहे कई गंभीर सवाल

बिना अप्रोच पथ के भवन निर्माण की स्वीकृति किसने दी.

जंगल में तब्दील परिसर की देखरेख की जिम्मेदारी किसकी है.

जाली हस्ताक्षर के आधार पर भुगतान कैसे हुआ.

सरकारी भवन होते हुए भी मरीजों का इलाज निजी भवन में क्यों कराया जा रहा है.

आज हालात ऐसे हैं कि मरीज ही नहीं, खुद स्वास्थ्य उप केंद्र इलाज मांग रहा है.

प्रशासनिक चुप्पी, फाइलों की खामोशी और परिसर में उगता जंगल, सब मिलकर यह सवाल खड़ा कर रहा है कि यह विकास है या सरकारी धन की खुली बर्बादी.

अब असली सवाल यह नहीं है कि भवन बना या नहीं, असली सवाल यह है कि जवाबदेही कब तय होगी.

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