लखीसराय में 78 साल बाद भी सतघरवा कोड़ासी में शुद्ध पानी के लिए तरस रहे लोग

Published by : Pratyush Prashant Updated At : 27 May 2026 9:40 AM

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लखीसराय के सतघरवा कोड़ासी गांव में आज भी लोग गंदा पानी पीने को मजबूर हैं. गांव का कुआं पीने लायक नहीं है

Lakhisarai Water Crisis: लखीसराय के सतघरवा कोड़ासी गांव में आज भी लोग गंदा पानी पीने को मजबूर हैं. गांव का कुआं पीने लायक नहीं है और चापाकल अक्सर खराब रहता है. ग्रामीण प्रशासन से शुद्ध पेयजल की मांग कर रहे हैं.

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चानन (लखीसराय) से रंजन पासवान की रिपोर्ट.

Lakhisarai Water Crisis: आजादी के 78 साल बाद भी भलुई पंचायत के सतघरवा कोड़ासी गांव में बुनियादी सुविधाओं का गंभीर अभाव बना हुआ है. करीब 40 घरों की आबादी वाला यह गांव आज भी शुद्ध पेयजल के लिए संघर्ष कर रहा है. गांव में पानी का मुख्य सहारा एक पुराना कुआं है, जिसका पानी इतना गंदा है कि लोग उसे छानकर पीने को मजबूर हैं. दूसरा विकल्प एक चापाकल है, जो ज्यादातर समय खराब पड़ा रहता है.

बढ़ रही लोगों की परेशानी

ग्रामीण रामटहल कोड़ा बताते हैं कि गांव के लोग जंगल से निकलने वाले झरने पर निर्भर हैं. सुबह पानी लाकर दिनभर उसी से खाना बनता है और प्यास बुझाई जाती है. रात में जरूरत पड़ने पर लोग मजबूरी में कुएं का पानी कपड़े से छानकर पीते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि गंदा पानी पीने से गांव में लोग अक्सर बीमार पड़ जाते हैं.

चुनावी वादा बनकर रह गई पेयजल योजना

गांव वालों का आरोप है कि चुनाव के समय नेता बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही कोई गांव की सुध लेने नहीं आता. ग्रामीणों के अनुसार सबसे ज्यादा शर्मिंदगी तब होती है जब गांव में किसी बेटी की शादी होती है और मेहमानों को साफ पानी तक नहीं मिल पाता.

प्रशासन तक पहुंची गुहार, फिर भी नहीं समाधान

ग्रामीणों ने बताया कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों को कई बार गांव की समस्या से अवगत कराया गया. यहां तक कि सर्च अभियान के दौरान पहुंचे अधिकारियों से भी गुहार लगाई गई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला. लोगों का कहना है कि आज भी वे भगवान भरोसे जिंदगी गुजार रहे हैं.

सड़क और रोजगार की समस्या भी गंभीर

पानी के अलावा गांव में सड़क और रोजगार की समस्या भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. गांव के आधे हिस्से में पीसीसी सड़क बनी है, लेकिन अब तक मुख्य सड़क से संपर्क नहीं जुड़ पाया है. ग्रामीणों का कहना है कि रोजगार के साधन नहीं होने से युवाओं को बाहर पलायन करना पड़ता है. अगर गांव में पत्तल उद्योग शुरू हो जाए तो बेरोजगारी काफी हद तक कम हो सकती है.

ग्रामीण बोले, अब तो मिले बुनियादी सुविधा

ग्रामीणों का दर्द छलक पड़ता है जब वे कहते हैं कि सालों तक नक्सल के डर में जिंदगी गुजारी, लेकिन अब शांति के दौर में भी बुनियादी सुविधाएं नसीब नहीं हो रही हैं. गांव वालों ने जिला प्रशासन से नल-जल योजना के तहत शुद्ध पेयजल और मुख्य सड़क से संपर्क पथ जोड़ने की मांग की है.

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लेखक के बारे में

By Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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