आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे बांस के कारीगर

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 09 Jun 2015 8:47 AM

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मेदनीचौकी: प्लास्टिक के बढ़ते प्रयोग ने सूर्यगढ़ा के हजारों कामगारों के हाथों का काम छीन लिया है. जबकि सर्वसुलभ तथा सस्ती बांस की उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह्र लगा है. इस प्रखंड के विभिन्न क्षेत्रों में मलिक, बढ़ई, मल्लाह, मछुआरे, माली आदि जातियों के लोग अपने हाथों से बांस की ढेर सारी उपयोगी चीजें बनाते रहे […]

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मेदनीचौकी: प्लास्टिक के बढ़ते प्रयोग ने सूर्यगढ़ा के हजारों कामगारों के हाथों का काम छीन लिया है. जबकि सर्वसुलभ तथा सस्ती बांस की उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह्र लगा है. इस प्रखंड के विभिन्न क्षेत्रों में मलिक, बढ़ई, मल्लाह, मछुआरे, माली आदि जातियों के लोग अपने हाथों से बांस की ढेर सारी उपयोगी चीजें बनाते रहे हैं.

समाज में निचले पायदान के मलिक जाति के लोग तो जन्म से ही कलाकार होते हैं. इस अंचल के मलिक प्राय: चारों तरफ झुग्गी-झोपड़ी में अपने कुत्ताें व सुअरों के साथ बसे हुए हैं. वे अपने हाथों से बांस की कमाचियों से खिलौने, बांसुरी, तीर-धनुष, पिंचड़ा, थैले, फूलदान, चटाई, नलकी, सूप, बाड़, टोकरी, डालिया आदि विविध वस्तुओं का निर्माण करते रहे हैं. इन्हीं से इनकी जीविका चलती रही है.

आज बांस के कारीगार बदहाल हैं. प्लास्टिक के प्रयोग ने मलिक जाति के लोगों के हाथों का निवाला छीन लिया. कॉलेज कर्मी राजेंद्र मलिक कहते हैं कि पहले शादी-विवाह के मौके पर बांस का ही मड़वा बनाया जाता है. पालकी का स्थान कार ने ले लिया. बांस की खेती भी कम हो रही है. जबकि देहात में किसान अपने रहने के लिए मकान तथा मवेशियों के लिए शेड बांस से ही बनाते हैं. मरने पर आदमी को बांस की ही अरथी मिलती है.

किसान खेतों में शीत धाम-वर्षा से बचने के लिए बांस का मचान बनाते हैं. अनाज भंडारण के लिए कोठी बांस की बनी होती है. देवी-देवताओं व शादी-विवाह में बांस की रंगारंग झापियां बनायी जाती हैं. जबकि आयुर्वेद में वंश लोचन दवा बांस से ही तैयार होती है. पूजा पंडाल, शादी पंडाल में बांस का इस्तेमाल होता है. बांस की कम होती जा रही खेती पर जिला पार्षद अमित सागर ने चिंता जतायी है. उन्होंने कहा कि क्षेत्र में बांस की खेती को बढ़ावा देने की जरूरत है. 2012 में तत्कालीन मुंगेर आयुक्त एसएम राजू ने बांस की खेती पर बल दिया था. प्रखंड की ताजपुर पंचायत समेत कई पंचायतों में बांस पौधों का रोपण किया गया जो बाढ़ में डूब गया, फिर उस ओर ध्यान नहीं दिया गया.

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