दशलक्षण पर्व के नौंवे दिन अकिंचन पर चर्चा
Updated at : 12 Sep 2019 6:41 AM (IST)
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ठाकुरगंज : दशलक्षण पर्व के तहत बुधवार को उत्तम अकिंचन धर्म की पूजा की गयी. इस अवसर पर भगवान की शांतिधारा के साथ पूजा अर्चना की गयी. दशलक्षण पर्व के नौवे दीन जयपुर से आये हुए पंडित निशु शास्त्री ने आकिंचन का अर्थ समझाते हुए कहा कि जगत में मेरा कुछ भी नहीं है जो […]
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ठाकुरगंज : दशलक्षण पर्व के तहत बुधवार को उत्तम अकिंचन धर्म की पूजा की गयी. इस अवसर पर भगवान की शांतिधारा के साथ पूजा अर्चना की गयी. दशलक्षण पर्व के नौवे दीन जयपुर से आये हुए पंडित निशु शास्त्री ने आकिंचन का अर्थ समझाते हुए कहा कि जगत में मेरा कुछ भी नहीं है जो कुछ भी है, यहीं का है और यहीं पर छूट जाने वाला है.
मैं इस जहां में अकेला आया हूं और अकेले ही मुझे चले जाना है. ये जो संसार का मेला दिख रहा है, यह सिर्फ दो दिन का है. मैं तो यहां मुसाफिर हूं, मेरा यहां अपना कुछ नहीं है, मेरा यहां अपना कोई नहीं है.
ये नाते-रिश्तेदार तो जब तक आंख खुली है, तब तक अपने दिखते हैं, आंख मुंदने के बाद तो आगे की यात्रा मुझे अकेले ही करनी है. सब छूटने वाले हैं या फिर छोड़ने वाले हैं. कोई इस जीव के न साथ जाता है, न आता है. इसलिये मैं कहता हूं, जीवन साथी तो बहुत मिल जाते हैं, लेकिन जीव का साथी कोई नहीं मिल पाता है. जीव को अपनी यात्रा एकाकी ही करनी होती है. इस एकाकीपन की साधना का नाम ही अकिंचन धर्म है.
पंडित जी के अनुसार जो इस प्रकार के भाव को धारण करता है, वह परिग्रह से रहित निष्परिग्रही दिगंबर त्व से संपन्न हो जाता है. जैन साधु इस भाव के कारण ही लंगोट तक का परिग्रह छोड़ दिगंबर हो जाते हैं, क्योंकि आकिचन भाव में जरा सी लंगोट भी बाधा पहुंचाती है. कहा भी है- एक लंगोट की ओट मन में अनंत खोट पैदा कर देती है.
अतः मन की खोट को मिटाने के लिये तन की लंगोट हटाकर मन के विकारों का परित्याग कर दिगंबर होना जरूरी है. नग्नता विकारों के त्याग से प्रगट होती है, इसलिये पूज्य है, पवित्र है. वही इस दौरान सर्वेश जैन ने बताया की अभी तक हमने क्षमा धारण करते हुए आर्जव, मार्जव, सत्य के लक्षणों को धारण करते हुए धर्म की ओर बढ़ गये है.
वही जैन समाज के मोहन जैन, राजेश जैन आदि ने बतया की इन दिनों में प्रायः सभी स्त्री पुरुष अपनी अपनी शक्ति के अनुसार व्रत-उपवास वगैरह करते है. कोई कोई दसों दिन उपवास करते है , बहुत से लोग दसों दिन तक एक बार भोजन करते है. इन्हीं दिनों में भाद्रपद शुक्ल दशमी को सुगंध दशमी पर्व होता है. इस दिन सब स्त्री पुरुष एकत्र होकर मंदिर में धूप देने के लिए जाते है.
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