कार्यस्थल पर महिलाकर्मी का शोषण रोकने के प्रति विभाग लापरवाह

Updated at : 04 Apr 2019 4:40 AM (IST)
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कार्यस्थल पर महिलाकर्मी का शोषण रोकने के प्रति विभाग लापरवाह

खगड़िया : प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मानसी की एक महिला डॉक्टर ने बीते वर्ष सिविल सर्जन को आवेदन देकर चिकित्सा पदाधिकारी द्वारा कार्यस्थल पर अनैतिक आचरण व लैंगिक शोषण का आरोप लगाया था. जांच के आदेश हुए लेकिन वह पूरी नहीं हुई. एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका ने प्रधानाध्यापक पर प्रताड़ित करने सहित लैंगिक शोषण का […]

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खगड़िया : प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मानसी की एक महिला डॉक्टर ने बीते वर्ष सिविल सर्जन को आवेदन देकर चिकित्सा पदाधिकारी द्वारा कार्यस्थल पर अनैतिक आचरण व लैंगिक शोषण का आरोप लगाया था.

जांच के आदेश हुए लेकिन वह पूरी नहीं हुई. एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका ने प्रधानाध्यापक पर प्रताड़ित करने सहित लैंगिक शोषण का आरोप लगाते हुए डीएम को आवेदन दिया. इस मामले में भी कार्रवाई तो दूर जांच तक पूरी नहीं की गयी.
खगड़िया में कार्यस्थल पर महिलाकर्मी के साथ शारीरिक व मानसिक शोषण की इस तरह की घटनाओं की लिस्ट लंबी है लेकिन विभागीय अधिकारी की लापरवाही के कारण इंसाफ के लिये पीड़ित महिलाओं को भटकना पड़ रहा है.
जबकि महिलाओं के साथ हो रहे शोषण की घटनाओं को रोकने के लिये वर्ष 2013 में अधिनियम पारित कर कई उपाय किये गये. लेकिन दुर्भाग्य है कि यह अधिनियम खगड़िया में धरातल पर नहीं उतर पाया है.
अधिनियम से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी
कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम 9 दिसम्बर, 2013 को प्रभाव में आया था. जैसा कि इसका नाम ही इसके उद्देश्य रोकथाम, निषेध और निवारण को स्पष्ट करता है और उल्लंघन के मामले में, पीड़ित को निवारण प्रदान करने के लिये भी ये कार्य करता है.
एक्सक्लूसिव
सरकारी कार्यालयों व निजी संस्थानों में आंतिरक/स्थानीय परिवाद समिति का गठन करने में दिलचस्पी नहीं ले रहे अधिकारी
महिला विकास निगम के प्रबंध निदेशक द्वारा बार बार पत्र भेजने के बाद भी नहीं सुन रहे कई विभागों के अधिकारी
कार्यस्थल पर महिलाओं के उत्पीड़न (निवारण, प्रतिशेद्य, प्रतितोष) अधिनियम 2013 के तहत गठित करना है समिति
खगड़िया में स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग में आये दिन कार्यस्थल पर महिलाकर्मियों के शोषण की मिलती रहती है शिकायत
लापरवाही से बढ़ रहा महिलाओं का दर्द
अधिनियम के तहत कार्यस्थल पर महिलाओं के लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेद्य एवं प्रतितोष) अधिनियम 2013 के आलोक में एसपी, एसडीओ, सिविल सर्जन, जिला शिक्षा पदाधिकारी, सभी बीडीओ, सभी सीडीपीओ एवं जिला स्तरीय सभी सरकारी, अर्द्ध सरकारी एवं प्राइवेट संस्थान के कार्यालयों में कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न रोकने एवं शिकायत निवारण के लिये आंतरिक परिवाद समिति का गठन किये जाने का आदेश दिया गया है.
खगड़िया में सिविल सर्जन, जिला शिक्षा पदाधिकारी, जीविका के डीपीएम सहित अन्य विभागों के अधिकारियों को पत्र भेजने के साथ साथ कई बार मौखिक रुप कहने के बाद भी समिति गठन करने के प्रति विभागीय अधिकारी लापरवाह बने हुए हैं.
महिला विकास निगम की डीपीएम जुलेखा हसमत ने साफ लहजे में कहा कि विभागीय अधिकारियों की लापरवाही के कारण कार्यस्थल पर महिलाओं का उत्पीड़न रोकने व शिकायत निवारण के लिये आंतरिक परिवाद समिति का गठन नहीं हो पाया है.
लिहाजा, कार्यस्थल पर प्रताड़ना की शिकार महिला कर्मियों को या तो लोकलाज के भय से चुप रह जाना पड़ता है या फिर जांच व कार्रवाई की लंबी प्रक्रिया व अधिकारियों की बेरुखी के कारण पीड़ित महिलाओं का दर्द बढ़ता जा रहा है.
शिकायत कब तक की जानी चाहिए
शिकायत करते समय घटना को घटे तीन महीने से ज्यादा समय नहीं बीता हो, और यदि एक से अधिक घटनाएं हुई है तो आखरी घटना की तारीख से तीन महीने तक का समय पीड़ित के पास है.
यदि आंतरिक शिकायत समिति को यह लगता है की इससे पहले पीड़ित शिकायत करने में असमर्थ थी तो यह सीमा बढाई जा सकती है, पर इसकी अवधि और तीन महीनों से ज्यादा नहीं बढाई जा सकती.
शिकायत दर्ज करने के बाद क्या होता है?
जांच की प्रक्रिया शुरू होगी, जिसे आंतरिक शिकायत समिति को 90 दिन में पूरा करना होगा. यह जांच संस्था/ कंपनी द्वारा तय की गई प्रकिया पर की जा सकती है, यदि संस्था/कंपनी की कोई तय प्रकिया नहीं है तो सामान्य कानून लागू होगा. समिति पीड़ित, आरोपी और गवाहों से पूछ ताछ कर सकती है और मुद्दे से जुड़े दस्तावेज़ भी मांग सकती है. समिति के सामने वकीलों को पेश होने की अनुमति नहीं है.
कानून क्या करता है
यह क़ानून कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को अवैध करार देता है
यह क़ानून यौन उत्पीड़न के विभिन्न प्रकारों को चिह्नित करता है, और यह बताता है कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की स्थिति में शिकायत किस प्रकार की जा सकती है
यह क़ानून हर उस महिला के लिए बना है जिसका किसी भी कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न हुआ हो
इस क़ानून में यह ज़रूरी नहीं है कि जिस कार्यस्थल पर महिला का उत्पीड़न हुआ है,वह वहां नौकरी करती हो
कार्यस्थल कोई भी कार्यालय/दफ्तर हो सकता है,चाहे वह निजी संस्थान हो या सरकारी शिकायत किसको की जानी चाहिए अगर आपके संगठन/ संस्थान में आंतरिक शिकायत समिति हैतो उसमें ही शिकायत करनी चाहिए. ऐसे सभी संगठन या संस्थान आंतरिक शिकायत समिति गठित करने के लिए बाध्य हैं.
अगर संगठन ने आंतरिक शिकायत समिति नहीं गठित की है तो पीड़ित को स्थानीय शिकायत समिति में शिकायत दर्ज करानी होगी.
व्यवहार या कृत्य
इच्छा के खिलाफ छूना या छूने की कोशिश करना
शारीरिक रिश्ता/यौन सम्बन्ध बनाने की मांग करना या उसकी उम्मीद करना.
यौन स्वभाव की (अश्लील) बातें करना.
यदि आपका सहकर्मी या अधिकारी आपकी इच्छा के खिलाफ आपको अश्लील वीडियो भेजता है, तो यह यौन उत्पीड़न है.
कोई अन्यकर्मी यौन प्रकृति के हों, जो बातचीत द्वारा, लिख कर या छू कर किये गए हों.
सभी सरकारी व गैर सरकारी कार्यालयों के प्रत्येक कार्यस्थल पर एक आंतरिक/स्थानीय शिकायत समिति गठित किया जाना है. महिला विकास निगम के प्रबंध निदेशक ने कई बार पत्र भेजे कर कार्यस्थल पर महिलाओं के लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेद्य एवं प्रतितोष) अधिनियम 2013 के आलोक में एसपी, एसडीओ, सिविल सर्जन, जिला शिक्षा पदाधिकारी, सभी बीडीओ, सभी सीडीपीओ एवं जिला स्तरीय सभी सरकारी, अर्द्ध सरकारी एवं प्राइवेट संस्थान के कार्यालयों में कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न रोकने एवं शिकायत निवारण के लिये आंतरिक परिवाद समिति का गठन किये जाने का आदेश दिया है.
सिविल सर्जन, जिला शिक्षा पदाधिकारी, जीविका के अधिकारी सहित अन्य विभागों के अधिकारी को पत्र भेजने के साथ साथ कई बार मौखिक रुप कहने के बाद भी समिति गठन करने के प्रति इन विभागों के अधिकारी लापरवाह बने हुए हैं. जबकि सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के आलोक में सभी कार्यालयों में समिति गठन कर रिपोर्ट राज्य मुख्यालय भेजना आवश्यक है.
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