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संघ शताब्दी वर्ष: संस्कारों की प्रयोगशाला है आरएसएस की शाखाएं

Updated at : 04 Feb 2026 7:15 PM (IST)
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संघ शताब्दी वर्ष: संस्कारों की प्रयोगशाला है आरएसएस की शाखाएं

संवाद कार्यक्रम में वक्ताओं ने रखे विचार

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– संवाद कार्यक्रम में वक्ताओं ने रखे विचार कटिहार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष भारत के तहत स्थानीय एक होटल में बौद्धिक संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया. आरएसएस के प्रांत सह प्रचारक प्रवीर ने मुख्य वक्ता के रूप में हिस्सा लिया. अधिवक्ता कुंदन कुमार ने संचालन करते हुए विषय प्रवेश कराया. कार्यक्रम में अधिवक्ता, चिकित्सक, सामाजिक कार्यकर्ता सहित विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. बौद्धिक संवाद में वक्ताओं ने कहा कि किसी भी संगठन के सौ वर्ष केवल समय की गणना नहीं होते. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास में एक ऐसे अध्याय का प्रतीक है. 1925 का भारत राजनीतिक पराधीनता से जूझ रहा था. पर उससे भी बड़ी चुनौती सामाजिक विखंडन थी. नागपुर में विजयादशमी के दिन डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ की स्थापना करते हुए स्पष्ट किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी स्थायी होगी. जब समाज संगठित, अनुशासित और चरित्रवान होगा. वक्ताओ ने कहा कि संघ ने शाखा पद्धति के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण की अनूठी प्रक्रिया विकसित की. दैनिक शाखा केवल व्यायाम का स्थल नहीं, बल्कि संस्कारों की प्रयोगशाला है. भेद नहीं, भाईचारा होता है. यही पद्धति संघ की स्थायी शक्ति का आधार बनी है. स्वतंत्रता और विभाजन के समय देश ने विस्थापन, हिंसा और असुरक्षा का दौर देखा है. ऐसे समय स्वयंसेवकों ने राहत, भोजन, पुनर्वास और सुरक्षा में उल्लेखनीय सेवा कार्य किया. यह सेवा किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि मानवता और कर्तव्यबोध से प्रेरित थी. विभाग प्रचारक मनु शेखर, प्रो एसएन पोद्दार, प्रो एसएन कर्ण, आचार्य अशोक कुमार चौधरी, प्रो सुरेंद्र झा, डॉ आशुतोष झा, डॉ रंजना झा, डॉ राजीव जायसवाल, किरण राय, डॉ जयेंद्र ज्ञानू, अभय नंद प्रसाद श्रीवास्तव, अरविंद सिंह, शिवशंकर सरकार, सुशील झा, अरुण चौधरी सहित बड़ी संख्या में बौद्धिक वर्ग से जुड़े लोग शामिल थे.

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