दीदी की रसोई ने किया 286 करोड़ का कारोबार, 5640 परिवारों की बदली जिंदगी

दीदी की रसोई
Jeevika Didi बिहार में जीविका योजना के तहत संचालित "दीदी की रसोई" तेजी से सफलता की नई कहानी लिख रही है. राज्यभर में इसकी 334 यूनिट्स खुल चुकी हैं, जिससे 5640 परिवारों को रोजगार मिला है. इस पहल के जरिए अब तक करीब 286 करोड़ रुपये का कारोबार हो चुका है, जो महिला सशक्तिकरण का मजबूत उदाहरण बनकर उभरा है.
Jeevika Didi : बिहार में महिला सशक्तिकरण की एक नई और सुनहरी इबारत लिखी जा रही है, जहां “दीदी की रसोई” न केवल स्वाद का केंद्र बनी है बल्कि राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का पावरहाउस बनकर उभरी है. राज्यभर में फैली सैकड़ों यूनिट्स के माध्यम से जीविका दीदियां अब प्रोफेशनल शेफ और बिजनेस मैनेजर की भूमिका में नजर आ रही हैं, जो बड़े-बड़े सरकारी संस्थानों का जायका बदल रही हैं.
“दीदी की रसोई” सिर्फ खाना परोसने का काम नहीं कर रही, बल्कि हजारों महिलाओं के जीवन में स्थायित्व और आत्मनिर्भरता ला रही है. समूह बनाकर महिलाएं खुद इन रसोइयों का संचालन करती हैं और आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं.
अस्पतालों से लेकर पुलिस लाइन तक का बदला स्वाद
दीदी की रसोई का विस्तार अब सिर्फ अस्पतालों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका दायरा पुलिस अकादमी, ओल्ड एज होम और आवासीय स्कूलों तक पहुंच गया है. पटना के नवीन पुलिस केंद्र से लेकर सुदूर जिलों के रजिस्ट्री ऑफिस तक, हर जगह महिलाओं द्वारा संचालित इन रसोइयों की मांग बढ़ रही है.
खास बात यह है कि यहां पुलिस के जवानों से लेकर बुजुर्गों तक को उनकी जरूरत और डाइट चार्ट के हिसाब से पोष्टिक भोजन परोसा जा रहा है.
डोसा से लेकर लिट्टी-चोखा
इन रसोइयों की सबसे बड़ी विशेषता इनका विविध मेन्यू है जो किसी बड़े रेस्टोरेंट को टक्कर देता है. यहां पारंपरिक दाल-भात, भुंजिया और लिट्टी-चोखा तो मिलता ही है, साथ ही साउथ इंडियन डिशेज और मीठे में रसगुल्ले की भी खूब डिमांड रहती है.
शाकाहारी भोजन के साथ-साथ कई केंद्रों पर चिकन और मटन चावल का भी स्वाद चखने को मिलता है, जिसे जीविका दीदी पूरी शुद्धता और स्वच्छता के साथ तैयार करती हैं.
लो-कॉस्ट मील मॉडल
यह पूरा प्रोजेक्ट न केवल मुनाफे के लिए है बल्कि एक ‘लो-कॉस्ट मील मॉडल’ पर आधारित है जो आम जनता को किफायती दरों पर गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराता है.
इस पहल ने राज्य के 5,640 परिवारों की माली हालत सुधार दी है, जिससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन गए हैं. जीविका समूहों के माध्यम से संचालित यह मॉडल आज पूरे देश के लिए महिला उद्यमिता की एक बेहतरीन मिसाल पेश कर रहा है.
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लेखक के बारे में
By Pratyush Prashant
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.
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