सिर्फ कागजों और कार्यक्रमों तक सिमटा इलाज

Updated at : 14 Mar 2026 9:52 PM (IST)
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सिर्फ कागजों और कार्यक्रमों तक सिमटा इलाज

टीबी, कैंसर व फाइलेरिया का मरीजों के लिए वार्ड तक नसीब नहीं

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जमुई. सदर अस्पताल में कहने को तो हर बीमारी के विशेषज्ञ और अलग विभाग मौजूद हैं, लेकिन हकीकत यह है कि गंभीर बीमारियों का इलाज केवल सरकारी कार्यक्रमों और फाइलों तक ही सीमित रह गया है. टीबी, कैंसर, फाइलेरिया और मानसिक रोग जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए अस्पताल में कोई समर्पित वार्ड उपलब्ध नहीं है. हालत यह है कि जानलेवा संक्रमण वाली इन बीमारियों के मरीजों को सामान्य मरीजों के बीच भर्ती किया जा रहा है, जिससे संक्रमण फैलने का बड़ा खतरा बना हुआ है.

केवल कार्यालयों तक सीमित हैं अधिकारी

सदर अस्पताल परिसर में एनसीडी क्लिनिक, यक्ष्मा विभाग और फाइलेरिया विभाग के लिए अलग-अलग भवन, पदाधिकारी और कर्मी तैनात हैं. लेकिन इनका काम केवल ओपीडी में मरीजों की जांच और दवा वितरण तक ही सीमित है. यदि किसी मरीज की स्थिति गंभीर हो जाती है, तो इन विशेष विभागों के पास उन्हें भर्ती करने की कोई सुविधा नहीं है.

होने वाली मुख्य समस्याएं

संक्रमण का खतरा :

टीबी जैसी अत्यधिक संक्रामक बीमारी के मरीजों को सामान्य वार्ड में भर्ती किया जाता है. इससे वहां मौजूद अन्य मरीजों और उनके परिजनों में संक्रमण फैलने की आशंका बनी रहती है.

विशेषज्ञों की अनुपस्थिति :

वार्ड में भर्ती होने के बाद संबंधित विभाग के विशेषज्ञ डॉक्टर या कर्मी मरीजों को देखने तक नहीं आते. सारा बोझ सामान्य वार्ड के चिकित्सकों पर रहता है.

राउंड पर भी नहीं आते विशेषज्ञ :

हैरानी की बात यह है कि जब सदर अस्पताल के चिकित्सक राउंड पर होते हैं, तो वे कैंसर या टीबी के मरीजों को परामर्श देने के बजाय अक्सर उन्हें वापस उन्हीं विभागों में जांच के लिए भेज देते हैं, जहां भर्ती की सुविधा ही नहीं है. ऐसे में मरीज अस्पताल के एक कोने से दूसरे कोने तक केवल चक्कर काटने को मजबूर हैं. विभागीय अधिकारियों का रवैया केवल कार्यालयी कार्यों और सरकारी खानापूर्ति तक ही सीमित होकर रह गया है. सदर अस्पताल में टीबी, कैंसर और फाइलेरिया के लिए अलग वार्ड न होना न केवल मरीजों के साथ अन्याय है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी एक बड़ी लापरवाही है.

मानसिक रोगियों की दुर्दशा :

मानसिक रोग से पीड़ित मरीजों के लिए भी कोई सुरक्षित स्थान नहीं है, जिससे वार्ड का माहौल भी प्रभावित होता है. विशेषज्ञ की देखरेख न मिलने के कारण गंभीर मरीजों की स्थिति और बिगड़ जाती है. जब विशेषज्ञ चिकित्सक और कर्मी वार्ड में मरीजों को सेवा ही नहीं दे रहे, तो इन विभागों पर होने वाला खर्च केवल कागजी प्रतीत होता है.

कहते हैं सीएस

इस संबंध में सिविल सर्जन डॉ अशोक कुमार सिंह ने बताया कि इसे लेकर विभाग को अवगत कराया गया है. विभाग के दिशा-निर्देश पर आगे की कार्रवाई की जायेगी.

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PANKAJ KUMAR SINGH

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By PANKAJ KUMAR SINGH

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