बरहट के गिद्दा मुसहरी में एक भी बच्चा मैट्रिक पास नहीं
Updated at : 29 Mar 2026 9:10 PM (IST)
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सरकार भले ही अनुसूचित जाति व जनजाति के उत्थान के लिए योजनाओं की लंबी सूची गिना रही हो, लेकिन बरहट प्रखंड की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है.
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मांझी समाज आजादी के दशकों बाद भी शिक्षा की रोशनी से अछूता बना हुआ है
शशिलाल,
बरहट. सरकार भले ही अनुसूचित जाति व जनजाति के उत्थान के लिए योजनाओं की लंबी सूची गिना रही हो, लेकिन बरहट प्रखंड की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है. बरहट पंचायत के वार्ड संख्या 14 स्थित गिद्दा मुसहरी टोला में मांझी समाज आजादी के दशकों बाद भी शिक्षा की रोशनी से अछूता बना हुआ है. इस टोले में 10 से 15 घरों में 250 से अधिक लोगों की आबादी है. इसके बावजूद भी बुनियादी शैक्षणिक माहौल का अभाव साफ दिखाई देता है. हालात इतने गंभीर हैं कि गांव से अब तक एक भी युवक मैट्रिक पास नहीं कर सका है, जो शिक्षा व्यवस्था की बदहाली को उजागर करता है. गरीबी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ से कम उम्र में ही बच्चों को घर की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए पढ़ाई छोड़नी पड़ती है और वे रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं. शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी और संसाधनों का अभाव स्थिति को और जटिल बना रहा है. नतीजतन यह टोला आज भी विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ है और नई पीढ़ी का भविष्य मजदूरी और अस्थायी रोजगार तक सिमटता नजर आ रहा है.गांव में चल रहा स्कूल बंद होने से शिक्षा व्यवस्था चरमरायी
ग्रामीणों के अनुसार, टोले के सामुदायिक भवन में पहले कक्षा एक से पांच तक प्राथमिक विद्यालय गिद्दा मुसहरी संचालित होता था, लेकिन करीब 9 वर्ष पूर्व इस विद्यालय को बंद कर उत्क्रमित मध्य विद्यालय सलैया में शिफ्ट कर दिया गया. स्कूल बंद होते ही गांव की शिक्षा व्यवस्था मानो ठप पड़ गयी. स्थानीय समाजसेवी श्रीकांत उर्फ बिट्टू, पंचायत समिति सदस्य महेंद्र मांझी, दिनेश यादव, सलेंद्र कुमार, कुंदन कुमार, भुतर मांझी और शंकर मांझी ने बताया कि स्कूल गांव में रहने से छोटे बच्चे आसानी से पढ़ने जाते थे, लेकिन अब दूरी और आर्थिक तंगी के कारण अभिभावक बच्चों को नियमित रूप से भेज नहीं पाते. जिसका नतीजा है कि गांव में चल रहा स्कूल बंद होने से शिक्षा व्यवस्था चरमरा गयी हैं.परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी शिक्षा में बन रही बाधा
गांव में शिक्षा की बदहाली का सबसे बड़ा असर बच्चों के भविष्य पर पड़ रहा है. कम उम्र में ही परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी उठाने के कारण बच्चे पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं और मजदूरी के लिए शहरों का रुख कर लेते हैं. समग्र सेवा संस्था द्वारा बच्चों को स्कूल से जोड़ने की कोशिशें की जा रही हैं, लेकिन गरीबी बड़ी बाधा बनी हुई है. संस्था के सौरव कुमार ने बताया कि समुदाय में शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी और आर्थिक संकट के कारण अधिकांश बच्चे आठवीं या उससे पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं. हालांकि, सरकार शिक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए कई तरह के जनकल्याणकारी योजना चला रही है.कहते हैं डीईओ
सर्व शिक्षा अभियान के तहत सभी वर्ग के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का कार्य चल रहा है. यदि गांव में एक भी बच्चा मैट्रिक पास नहीं है, तो यह गंभीर विषय है. इस मामले को लेकर प्रखंड स्तर के पदाधिकारियों से बातचीत कर स्थिति की समीक्षा की जायेगी और बच्चों को उच्च शिक्षा से जोड़ने के लिए आगे की रूप रेखा तैयार की जायेगी.दयाशंकर, डीईओ
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