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हिंदी व हिंदी भाषियों का अपमान भारत माता का अपमान

Updated at : 13 Jul 2025 9:12 PM (IST)
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हिंदी व हिंदी भाषियों का अपमान भारत माता का अपमान

केकेएम कॉलेज के अर्थशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो डॉ गौरीशंकर पासवान ने महाराष्ट्र में हिंदी भाषा और हिंदी भाषियों के साथ हो रहे अपमानजनक व्यवहार पर गहरी चिंता जतायी.

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जमुई. केकेएम कॉलेज के अर्थशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो डॉ गौरीशंकर पासवान ने महाराष्ट्र में हिंदी भाषा और हिंदी भाषियों के साथ हो रहे अपमानजनक व्यवहार पर गहरी चिंता जतायी. उन्होंने कहा कि हिंदी और हिंदी भाषियों का अपमान भारत माता का अपमान है. यह भारतीय संविधान और उसकी आत्मा का भी खुला उल्लंघन है. हिंदी को राष्ट्रभाषा और राजभाषा बनाने की लड़ाई पूरे देश के नेताओं ने मिलकर लड़ी थी. आजादी के 77 वर्षों बाद भी दक्षिण भारत तथा महाराष्ट्र जैसे गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी और हिंदी भाषियों के प्रति नफरत की राजनीति की जा रही है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है. उन्होंने महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के समर्थकों द्वारा हिंदी का तिरस्कार करने को राष्ट्रीय चिंता बताया और संविधान के अनुच्छेद का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 19(1)(e) के तहत देश के किसी भी नागरिक को भारत में कहीं भी रहने, घूमने और काम करने का अधिकार प्राप्त है. अनुच्छेद 343(1) के तहत हिंदी को राजभाषा और राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया है. इसके बावजूद हिंदी भाषियों के साथ हिंसा और भेदभाव असंवैधानिक है. मुंबई कभी भारत के मेहनतकशों की कर्मभूमि थी, लेकिन अब कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले नेताओं की संकुचित सोच की भेंट चढ़ रही है. उन्होंने ठाकरे बंधुओं पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि एक ओर वे हिंदी का उपयोग कर राजनीति करते हैं, वहीं दूसरी ओर हिंदी भाषियों को अपमानित करते हैं. उन्होंने कहा कि आठ करोड़ मराठी भाषियों की भावनाओं के नाम पर 45 से 52 करोड़ हिंदी भाषियों के प्रति ज़हर घोलना, देश को तोड़ने की साजिश का हिस्सा है. केकेएम कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ कैलाश पंडित ने भी कहा कि भारत एक बहुभाषी देश है, जहां हर भाषा का सम्मान जरूरी है. मुंबई में मराठी अस्मिता के नाम पर हिंदी भाषियों पर हमले न केवल संविधान के खिलाफ हैं, बल्कि ये भाषा की राजनीति कर देश को बांटने की कोशिश है. उन्होंने कहा कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाल गंगाधर तिलक, काका कालेलकर, श्रीनिवास शास्त्री, सी राजगोपालाचारी, महात्मा गांधी, सरदार पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस सहित सभी महापुरुषों ने हिंदी को जोड़ने वाली भाषा के रूप में देखा था. ऐसे में आज के नेताओं के द्वारा हिंदी और हिंदी भाषियों का विरोध करना दुर्भावनापूर्ण और राष्ट्र विरोधी कृत्य है. दोनों प्राध्यापक ने देशवासियों से अपील करते हुए कहा कि भाषा के नाम पर देश को तोड़ने वालों के खिलाफ खड़े हों और हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करें.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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PANKAJ KUMAR SINGH

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