बिहारशरीफ का गौरवशाली बीड़ी उद्योग संकट में: कभी विदेशों तक थी पहचान, अब अस्तित्व की लड़ाई
बीड़ी उद्योग की तस्वीर
Bihar Sharif News : कभी अमेरिका-अरब तक पहुंचती थी मांग, आज सिमटता जा रहा बिहारशरीफ का बीड़ी उद्योग.
बिहारशरीफ कंचन कुमार की रिपोर्ट
Bihar Sharif News : नालंदा जिला मुख्यालय बिहारशरीफ की पहचान कभी देश के प्रमुख बीड़ी उत्पादन केंद्रों में होती थी. यहां निर्मित बीड़ी की मांग न केवल भारत के विभिन्न राज्यों में थी, बल्कि अरब देशों और अमेरिका तक इसकी सप्लाई होती थी. लेकिन समय के साथ यह उद्योग अब अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहा है. बढ़ते सिगरेट बाजार, जीएसटी, श्रमिक कल्याण योजनाओं के कमजोर पड़ने और नई पीढ़ी की बेरुखी के कारण बिहारशरीफ का ऐतिहासिक बीड़ी उद्योग धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है.
पांच वर्षों में आधा रह गया उत्पादन
वर्ष 2017 तक बिहारशरीफ में प्रतिदिन 40 से 50 लाख बीड़ियों का उत्पादन होता था. वर्तमान में यह आंकड़ा घटकर 20 से 25 लाख बीड़ी प्रतिदिन रह गया है. उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि बीड़ी पर जीएसटी लागू होने तथा लेबर वेलफेयर कमेटी के निष्क्रिय होने के बाद उद्योग को सबसे बड़ा झटका लगा है.
1935 से शुरू हुआ था बिहारशरीफ मे बीड़ी उद्योग
बिहारशरीफ में बीड़ी उद्योग की शुरुआत वर्ष 1935 से 1943 के बीच हुई थी. 1970 से 1990 के दशक तक यह उद्योग अपने स्वर्णिम दौर में था. उस समय यहां बनी बीड़ियों की मांग पूरे देश के साथ-साथ खाड़ी देशों और अमेरिका तक थी. उद्योग से जुड़े जानकार बताते हैं कि 1970 के दशक में गुजरात बंदरगाह के माध्यम से हर महीने चार ट्रक बीड़ी अरब देशों को भेजी जाती थी. इतना ही नहीं, गणेश बीड़ी कंपनी की करीब 14 करोड़ बीड़ियां प्रतिवर्ष अमेरिका भेजी जाती थीं. वर्ष 1977 में देशभर में लगभग एक करोड़ बीड़ी श्रमिक कार्यरत थे, जिनमें 20 हजार से अधिक श्रमिक केवल बिहारशरीफ में काम करते थे.
तीन कंपनियों के भरोसे चल रहा कारोबार
वर्तमान में बिहारशरीफ में तीन प्रमुख कंपनियों के माध्यम से करीब 8,798 मजदूर बीड़ी निर्माण कार्य से जुड़े हुए हैं. इनमें एसके नसउद्दीन बीड़ी कंपनी, लौगिया बीड़ी कंपनी और सऊद फिरोज बीड़ी कंपनी शामिल हैं. ये कंपनियां श्रमिकों को तेंदू पत्ता, तंबाकू और सूता उपलब्ध कराती हैं, जबकि तैयार बीड़ी वापस लेकर बाजारों में भेजती हैं. आज भी बिहारशरीफ के आशानगर, सोहसराय, इमादपुर, छज्जूबाग, कटरापर, कटहल टोला, मुरादपुर और भैंसासुर जैसे इलाकों के हजारों परिवारों की आजीविका बीड़ी उद्योग पर निर्भर है.
मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ से आता है तेंदू पत्ता
बिहारशरीफ में बनने वाली बीड़ी के लिए तेंदू पत्ता मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के जंगलों से मंगाया जाता है. वहीं बीड़ी निर्माण में इस्तेमाल होने वाला तंबाकू गुजरात के नेपानी और सूरत क्षेत्र से आता है. इन कच्चे मालों को कंपनियां बिहारशरीफ के मजदूरों तक पहुंचाती हैं. बीड़ी श्रमिकों को प्रति हजार बीड़ी निर्माण पर करीब 175 रुपये मजदूरी मिलती है. एक मजदूर प्रतिदिन औसतन 1,500 से 3,500 बीड़ियां तैयार करता है.
असम, त्रिपुरा और बेतिया तक पहुंच रही बिहारशरीफ की बीड़ी
हालांकि उत्पादन में गिरावट आई है, फिर भी बिहारशरीफ में निर्मित बीड़ी की मांग अभी भी बनी हुई है. यहां तैयार बीड़ियां त्रिपुरा के अगरतल्ला, आसाम, कोलकाता और बिहार के बेतिया सहित कई बाजारों में भेजी जा रही हैं. स्थानीय स्तर पर भी एक बड़ा उपभोक्ता वर्ग आज भी बीड़ी का उपयोग कर रहा है.
जीएसटी और कानूनों ने बढ़ाई मुश्किलें
वर्ष 2017 में बीड़ी उत्पादन और बिक्री पर 28 प्रतिशत जीएसटी लागू किया गया. इसके साथ ही इसे कोटपा कानून के अंतर्गत भी शामिल कर दिया गया, जिससे बीड़ी उत्पादों के प्रचार-प्रसार पर रोक लग गई. उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि इन बदलावों ने पहले से संघर्ष कर रहे बीड़ी उद्योग को और कमजोर कर दिया.
लेबर वेलफेयर कमेटी के खत्म होने से श्रमिकों को बड़ा नुकसान
बीड़ी मजदूरों का कहना है कि पहले लेबर वेलफेयर कमेटी उनके हितों की रक्षा करती थी. मजदूरों के वेतन से कटौती कर ईपीएफ की सुविधा दी जाती थी और निर्धारित अवधि तक योगदान करने के बाद पेंशन का लाभ भी मिलता था. इसके अलावा श्रमिकों और उनके परिवारों को छात्रवृत्ति, चिकित्सा सहायता, आवास निर्माण के लिए आर्थिक मदद, पोशाक भत्ता और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिलता था. लेकिन कमेटी के निष्क्रिय होने के बाद अधिकांश सुविधाएं बंद हो गई हैं. भारतीय मजदूर संघ के संरक्षक कनक प्रकाश का कहना है कि लेबर वेलफेयर कमेटी की सक्रियता के कारण ही बीड़ी श्रमिकों को कई महत्वपूर्ण सुविधाएं मिलती थीं. इसके समाप्त होने से कंपनियां इन सुविधाओं को देने की बाध्यता से लगभग मुक्त हो गई हैं.
पहचान बचाने की जद्दोजहद
कभी बिहारशरीफ की अर्थव्यवस्था और पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा बीड़ी उद्योग आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है. उत्पादन घट रहा है, श्रमिकों की संख्या कम हो रही है और नई पीढ़ी इस क्षेत्र से दूर जा रही है. ऐसे में उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि सरकार और संबंधित एजेंसियों ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए तो बिहारशरीफ का यह ऐतिहासिक उद्योग आने वाले वर्षों में पूरी तरह समाप्त होने की कगार पर पहुंच सकता है.
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