पंक्चर बना बेटे को बनाया रेलवे में अधिकारी
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 26 Dec 2015 6:30 PM
पंक्चर बना बेटे को बनाया रेलवे में अधिकारी अपने सपनों को बेटे से कराया साकार मुसीबतों में भी विचलित नहीं हुआ रामाशीष संडे खासफोटो न.11सुरेश कुमार राय, भोरे मैं हार कभी नहीं मानूंगा, मैं विजय पताका गाड़ूंगा. मैं काल के सिर चढ़ बोलूंगा, फिर नया पृष्ठ एक खोलूंगा. रचूंगा उसमें एक सपना, चाहूंगा हो जाये […]
पंक्चर बना बेटे को बनाया रेलवे में अधिकारी अपने सपनों को बेटे से कराया साकार मुसीबतों में भी विचलित नहीं हुआ रामाशीष संडे खासफोटो न.11सुरेश कुमार राय, भोरे मैं हार कभी नहीं मानूंगा, मैं विजय पताका गाड़ूंगा. मैं काल के सिर चढ़ बोलूंगा, फिर नया पृष्ठ एक खोलूंगा. रचूंगा उसमें एक सपना, चाहूंगा हो जाये अपना. अपना होवे या होवे गैर, रुकेंगे नहीं मेरे ये पैर, मुझे आगे बढ़ते जाना है, सपनों को अपना बनाना है’ कविता की ये पंक्तियां भोरे प्रखंड के लामीचौर निवासी रामाशीष राम पर पूरी तरह सच साबित होती है. रामाशीष उस व्यक्ति का नाम है, जिसने सपने तो बड़े देखे थे, किंतु गरीबी की चक्की में उसके सारे सपने चूर हो गये. इसके कारण उसे मैट्रिक के बाद शिक्षा नहीं मिल पायी. अपने बिखरे सपनों के मलबे को सहेज कर उसने वह कर दिखाया, जो आज हर पिता के लिए मिसाल है. स्वयं मैट्रिक के बाद पढ़ाई बंद कर रामाशीष ने परिवार को भरण-पोषण के लिए साइकिल व मोटरसाइकिल का पंक्चर बनाने का काम शुरू किया. उसके सपने उसे सोने नहीं देते थे. उसने तय किया कि अपने अधूरे सपने को अपने पुत्रों के माध्यम से पूरा करूंगा. बेटे चंदेश्वर राम ने भी पिता के संघर्ष का सम्मान देते हुए 2015 में रेलवे अधिकारी बन कर अपने पिता के अरमानों को पूरा किया. फटेहाल जिंदगी जी रहे रामाशीष रोज सुबह लामीचौर स्थित अपनी दुकान पर पहुंच जाता. शाम को परिवार के लिए दाल-रोटी की जुगाड़ के साथ-साथ बच्चों की पढ़ाई की चिंता भी उसे घेरे रहती. विपरीत परिस्थितियों में भी पूरा किया सपना गरीबी की मार झेल रहे रामाशीष अपने बच्चों में नित्य सपने बुनता रहा. इसका परिणाम यह निकला कि बड़ा बेटा चंदेश्वर राम ने प्रारंभिक शिक्षा लामीचौर के सरकारी विद्यालय में पूरी करते हुए उच्च शिक्षा भोरे के बीपीएस कॉलेज से ली. एक तरफ पूरे परिवार के सामने रोटी की समस्या थी, तो दूसरी तरफ बेटे के कैरियर की फिक्र. चंदेश्वर ने पिता की स्थिति को समझते हुए प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए किसी बड़े शहर की ओर रुख नहीं करते हुए घर में तैयारी शुरू कर दी. कड़ी मेहनत और सपनों को साकार करने का जज्बा लिये चंदेश्वर ने पहले ही प्रयास में रेलवे बोर्ड की परीक्षा पास की. फिलहाल वह आरा में बतौर सहायक स्टेशन मास्टर के पद पर कार्यरत है. खत्म नहीं हुई जिम्मेवारीएक बेटे को रेलवे में अधिकारी बना कर रामाशीष के हौसले काफी बुलंद हैं. संघर्ष के बीच उसने अपने दूसरे बेटे अभिषेक कुमार को इंटर साइंस की तालीम दिलवा रहा है, वहीं बेटी पुष्पा कुमारी बीए एवं दूसरी बेटी विद्यावती कुमारी बीएससी कर अपने कैरियर की तलाश कर रही है. फिलहाल रामाशीष का संघर्ष पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है.
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