स्कूलों की लाइब्रेरी में किताबों का ठिकाना नहीं

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स्कूलों की लाइब्रेरी में किताबों का ठिकाना नहींबैकुंठपुर. स्कूलों की लाइब्रेरी केवल कहने के लिए है. किताब खोजने से भी नहीं मिलते. लाइब्रेरी के लिए किताबों की खरीदारी हुई, मगर किसी स्कूल में किताबों का ठिकाना नहीं है. यहां लाइब्रेरी की परिभाषा मात्र कागजों में सिमट कर रह गयी है. स्कूल में बच्चे किताबों के […]

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स्कूलों की लाइब्रेरी में किताबों का ठिकाना नहींबैकुंठपुर. स्कूलों की लाइब्रेरी केवल कहने के लिए है. किताब खोजने से भी नहीं मिलते. लाइब्रेरी के लिए किताबों की खरीदारी हुई, मगर किसी स्कूल में किताबों का ठिकाना नहीं है. यहां लाइब्रेरी की परिभाषा मात्र कागजों में सिमट कर रह गयी है. स्कूल में बच्चे किताबों के लिए खाक छानते हैं. यह स्थिति कहीं एक जगह की नहीं, बल्कि तमाम हाइस्कूलों व मीडिल स्कूलों में है. ऐसी बात नहीं कि किताबें खरीदी नहीं गयीं. मजेदार बात तो यह है कि स्कूल में किताब आये तो जरूर, पर देखने को भी नहीं मिलता है. ज्ञान का धरोहर एक से बढ़ कर एक किताबें गायब हो गयीं. कुछ जगह है भी, तो स्कूल के किसी कमरे में कैद हो धूल फांक रही है, या बच्चों के पढ़ने के बजाय दीमक चाट रहे हैं. सरकार की अच्छी सोच सतह पर आखिर कैसे सफल हो सकेगी, यह चिंता की बात है. सर्वशिक्षा अभियान के द्वारा स्कूलों को भरपूर राशि मुहैया करायी गयी थी. इस योजना की सार्थकता कितनी हो रही है, इसे देखने की जरूरत शायद शिक्षा विभाग को नहीं है. पुस्तकालय कागजों में दौड़ रही है. किताब के नाम पर सरकारी राशि खर्च होने के बावजूद पुस्तकालयों का हाल खस्ता है. इसे इच्छाशिक्त का अभाव कहेंगे या कर्तव्यहीनता, बच्चों को इसका सही लाभ नहीं मिल पा रहा है. इसे गंभीरता से लेते हुए स्थानीय विधायक मिथलेश कुमार तिवारी ने कहा कि बच्चों के लिए सिलेबस के अलावा एडिशनल किताबों का अध्ययन बहुत जरूरी है. इससे बौद्धिक विकास का मार्ग सुगम होता है. स्कूलों के लाइब्रेरी का सही क्रियान्वयन हो, इसके लिए आवश्यक कदम उठाये जायेंगे.

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