पानी बना नहीं सकते, पर बचा तो सकते हैं

Published at :05 Jun 2018 7:40 AM (IST)
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पानी बना नहीं सकते, पर बचा तो सकते हैं

मकान, बाजार, दवा, वस्त्र, सड़क, नहर, तालाब तथा विकास व विलासिता के लिहाज से जरूरी तमाम किस्म की दूसरी चीजें बनाना इंसान के लिए आज संभव है. पर, प्रकृति ने हमें कई ऐसे उपहार दिये हैं, जिनकी कॉपी करने में हम अब भी सफल नहीं हो सके हैं. जल भी जीवन का ऐसा ही एक […]

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मकान, बाजार, दवा, वस्त्र, सड़क, नहर, तालाब तथा विकास व विलासिता के लिहाज से जरूरी तमाम किस्म की दूसरी चीजें बनाना इंसान के लिए आज संभव है. पर, प्रकृति ने हमें कई ऐसे उपहार दिये हैं, जिनकी कॉपी करने में हम अब भी सफल नहीं हो सके हैं. जल भी जीवन का ऐसा ही एक अति महत्वपूर्ण अवयव है, जिसे बना पाना हमारे लिए संभव नहीं है.
हालांकि, हम इसे बचाने में अवश्य अपनी भूमिका सुनिश्चित कर सकते हैं. ये बातें प्रभात खबर की पहल पर पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर विष्णुपद के निकट फल्गु के तट पर जल संपदा बचाओ अभियान के तहत आयोजित एक संवाद में भाग ले रहे अधिकतर वक्ताओं की राय में शामिल थीं. कार्यक्रम में भाग ले रहे वक्ताओं में गृहिणी, व्यवसायी, जनप्रतिनिधि, अधिकारी-कर्मचारी, साहित्यसेवी, समाजसेवी व शिक्षक समुदाय से जुड़े लोग शामिल हुए. कमोबेश हर व्यक्ति इस बात पर सहमत था कि जल संपदाओं को बचाने की चुनौती गंभीर है.
अगर इन्हें नहीं बचाया गया, तो देश-दुनिया में व्यापक असर छोड़नेवाला जल संकट अवश्यंभावी है. इससे बचने के लिए जरूरी है कि जल के रूप में प्रकृति से मिले इस अनुपम उपहार का हम पूरी संजीदगी के साथ वर्तमान में उपयोग करें और भ‌विष्य के लिए संरक्षण.ऊपरोक्त विषय पर चर्चा के आरंभिक दौर में प्रभात खबर के स्थानीय संपादक कौशल किशोर त्रिवेदी ने कई उदाहरण पेश करते हुए बताया कि किस तरह जल के भंडारण व उपयोग के मामले में हमारा समाज लंबे समय से अगंभीर रहा है.
इस सिलसिले में उन्होंने आज की तारीख में गंगा में पानी की उपलब्धता का हवाला देते हुए बताया कि कैसे एक तरफ जलस्रोत सिकुड़ रहे हैं,
बर्बाद हो रहे हैं, नदियां इंसान का साथ छोड़ रही हैं और दूसरी तरफ समाज व सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं. उन्होंने बताया कि कैसे शहर से लेकर गांव तक कुएं खत्म होते जा रहे हैं, तालाब भरे जा रहे हैं और लोग नदियों में मकान खड़े कर रहे हैं.
इसके लिए मुख्य रूप से आमलोगों में जागरूकता व संवेदनशीलता की कमी और प्रशासनिक मशीनरी की लचर स्थिति को जिम्मेवार बताते हुए उन्होंने संवाद में भाग ले रहे लोगों से अपील की कि वे इंसानी जिंदगी के हित में जल स्रोतों के संरक्षण के लिए आगे आएं तथा ठोस पहल करें. कार्यक्रम में भाग ले रहे शहर-समाज के जिम्मेदार लोगों ने जल संपदाओं के संरक्षण पर बोलते हुए कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिये.
प्रशासनिक हस्तक्षेप भी है जरूरी
वक्ताओं ने कहा कि जल संरक्षण को लेकर प्रशासनिक स्तर पर भी कभी कारगर उपाय नहीं किये गये. कभी किसी प्रशासनिक पदाधिकारी ने कोशिश नहीं की, जबकि यह बहुत जरूरी है. हर संगोष्ठी – सेमिनार में रेन वाटर हार्वेस्टिंग पर बात होती है. लेकिन क्या कभी किसी ने इस पर पहल की? नहीं. यह जिम्मेदारी नगर सरकार की है कि वह तय करे कि हर घर जल संरक्षण के उपायों के साथ ही तैयार हो.
किसी भी इमारत, चाहे वह आवासीय हो या व्यावसायिक, उसका नक्शा तब ही पास हो जब उसमें रेन वाटर हार्वेस्टिंग या जल संचय के दूसरे उपाय किये गये हों. बिहार नगर पालिका अधिनियम में इसका उल्लेख भी है. जल संचय के उपाय करने वाले मकान मालिक को टैक्स में भी छूट दी जाती है. वक्ताओं ने कहा कि अफसोस की बात है कि नगर निगम कभी इसकी जानकारी देता ही नहीं. वक्ताओं ने कहा कि यह भी बहुत जरूरी है कि घरों में बोरिंग पर भी रोक लगे.
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