हिपोक्रेटिक ओथ की जगह डॉक्टर अब लेंगे चरक शपथ, आइएमए ने बताया विवादित फैसला

इस प्रस्ताव पर बिहार के चिकित्सक एक मत नहीं हैं. एनएमसी ने कहा है कि मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सकों को हिपोक्रेटिक ओथ की जगह चरक शपथ दिलायी जायेगी.
पटना. नेशनल मेडिकल काउंसिल (एनएमसी) के मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सकों को नये शपथ पत्र दिलाने के प्रस्ताव पर विवाद पैदा हो गया है. इस प्रस्ताव पर बिहार के चिकित्सक एक मत नहीं हैं. एनएमसी ने कहा है कि मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सकों को हिपोक्रेटिक ओथ की जगह चरक शपथ दिलायी जायेगी.
बिहार से जुड़े विश्वविख्यात वैद्य चरक ने उस समय वैद्यों के लिए शपथ पत्र तैयार किया था. एक बार फिर वोकल फॉर लोकल की तर्ज पर एनएमसी ने भारतीय वैद्य के शपथ को चिकित्सा जगत में लाने का प्रयास किया है. हिपोक्रेटिक ओथ कुछ शताब्दी पुराना है जबकि चरक शपथ कई सदियों पुरानी है.
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा सहजानंद प्रसाद सिंह ने एनएमसी के नये प्रस्ताव को लेकर कहा कि अभी यह विवादित प्रस्ताव हैं. उन्होंने कहा कि इस पर फिलहाल वह कुछ भी प्रतिक्रिया नहीं देंगे. आइएए की राष्ट्रीय परिषद की बैठक 19 व 20 फरवरी को दिल्ली में आयोजित की गयी है. यह मुद्दा राष्ट्रीय परिषद की बैठक में रखा जायेगा. फिलहाल जो एथिक्स है, उसे बरकरार रखना है.
विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष व प्रसिद्ध हड्डी रोग विशेषज्ञ डा आरएन सिंह ने नेशनल मेडिकल काउंसिल के प्रस्ताव पर कहा कि कोई भी नया चीज करना चाहते हैं तो वह करें. सवाल यह नहीं है कि शपथ क्या हो. बात यह है कि चिकित्सक जिसका भी शपथ लें उसकी गरिमा को बनाये रखें. शपथ एक ही होता है चाहे वह हिपोक्रेटिक ओथ हो या चरक शपथ. वह इस विवाद पर कुछ भी नहीं कह सकते.
नेशनल मेडिकल काउंसिल के नये प्रस्ताव का पद्मश्री से नवाजे गये व प्रसिद्ध चिकित्सक डा एसएन आर्या ने स्वागत किया है. उन्होंने कहा कि यह एक बढ़िया काम किया गया है. आखिर ब्रिटिश शासन की परंपरा को भारत कब तक ढ़ोता रहेगा. चरक शपथ समावेशी है. उन्होंने कहा कि वह कई अवसरों पर निजी तौर पर पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल, दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल, गया मेडिकल कॉलेज अस्पताल और अन्य अस्पतालों में बोल्ड अक्षरों में चरक शपथ पत्र की पोस्टर लगवाते रहे हैं.
राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज दरभंगा के प्राचार्य डा दिनेश्वर प्रसाद ने बताया कि चरक विश्व के प्राचीनतम वैद्य हैं. एसोपैथ का इतिहास तो 150-200 साल पुराना है. चरक की ऐतिहासिकता है कि उनकी संहिता को 10 देशों ने अनुवाद कराया है. चरक संहिता की अरबी में भी अनुवाद हुआ है. यह आपत्ति का विषय नहीं होना चाहिए कि चिकित्सक अपनी स्वदेशी संहिता में शपथ लें.
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