ध्यानार्थ ::::ग्रामीणों ने पेश की मिशाल, 80 लाख की लागत से बना डाला पुल

Published at :15 Jan 2016 6:58 PM (IST)
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ध्यानार्थ ::::ग्रामीणों ने पेश की मिशाल, 80 लाख की लागत से बना डाला पुल

ध्यानार्थ ::::ग्रामीणों ने पेश की मिशाल, 80 लाख की लागत से बना डाला पुल फोटो:::::::9 व 10परिचय : पुल बनने से पहले की स्थिति, पुल निर्माण होने के बाद ग्रामीणों से मिले अब तक 20 लाख की सहयोग राशि बाकी पैसे का इंतजाम शहीद के भाई अजय चौधरी ने की विधायक व जिला प्रशासन से […]

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ध्यानार्थ ::::ग्रामीणों ने पेश की मिशाल, 80 लाख की लागत से बना डाला पुल फोटो:::::::9 व 10परिचय : पुल बनने से पहले की स्थिति, पुल निर्माण होने के बाद ग्रामीणों से मिले अब तक 20 लाख की सहयोग राशि बाकी पैसे का इंतजाम शहीद के भाई अजय चौधरी ने की विधायक व जिला प्रशासन से मिला एप्रौच सड़क बनाने का आश्वासनसब कुछ ठीक रहा तो फरवरी के अंतिम सप्ताह में हो जायेगा उद्घाटन कमतौल (दरभंगा), प्रतिनिधि : कमतौल-टेकटार के बीच डीकेबीएम एसएच-75 पथ के पूरब कमला (धौंस) नदी के दुधैल घाट पर ग्रामीणों के सहयोग से करीब अस्सी लाख की लागत से बनाये गए स्क्रू पाइल पुल की चर्चा सरेआम है़ सिंघिया, लालपुर, सादुल्लहपुर सहित कई अन्य गांव के लोगों ने पुल निर्माण में सहयोग कर मिशाल कायम किया है़ खास बात यह है की अब तक हुए पुल निर्माण कार्य में एक पैसा भी सरकारी स्तर से नहीं लगा है़ पुल बनकर तैयार है़ एप्रोच पथ निर्माण के लिए विधायक और डीएम से सहयोग मिलने का आश्वासन मिला है़ पुल जन सहयोग से बनकर तैयार है, पुल के उपर अभी आरसीसी होना शेष है़ रिटेनिंग बाल और संपर्क पथ बनाने का काम जारी है़ सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो फरवरी के अंतिम सप्ताह तक डेंटिंग-पेंटिंग करा पुल का विधिवत उद्घाटन कर आमलोग की सेवा में समर्पित कर दिया जायेगा़ पुल निर्माण समिति के अध्यक्ष कौशल किशोर तिवारी ने बताया स्थानीय स्तर पर पांच पंचायत के लोगों से अब तक करीब बीस लाख रुपये मिले हैं और मिलने की उम्मीद है़ चंदा में कम से कम एक हजार लिया जाता है. एक व्यक्ति ने अधिकतम पचास हजार दिया है़ शेष राशि का इंतजाम पुल निर्माण का सपना देखने वाले अजय कुमार चौधरी कर रहे है़ं शहीद विश्वंभर चौधरी के नाम पर होगा पुल का नामाकरण पुल का नाम शहीद विश्वंभर चौधरी सेतु रखा जायेगा़ बता दें की स्थानीय लालपुर गांव निवासी अजय चौधरी के बड़े भाई विश्वंभर चौधरी, जो वर्ष 2009 में चुनावी ड्यूटी के दौरान गया में नक्सली हिंसा में शहीद हो गये थे़ अपने भाई को सार्वजनिक काम में बढ़ चढ़ कर सहयोग करने की नसीहत देते रहते थे़ उन्हीं की बदौलत पुल का निर्माण संभव हो सका है़ बताया गया कि दुधैल घाट पर बने स्क्रू पाइल पुल तक जाने के लिए पश्चिम दिशा से बनी सड़क नदी किनारे तक गयी थी़ परन्तु पूरब दिशा में निजी खेत होने से एप्रोच पथ को लेकर संशय की स्थिति बन रही थी, स्थानीय भू-स्वामी डा़ प्रो़ पीएन सिंह ने उत्साही ग्रामीणों का जज्बा देख एप्रोच पथ के लिए जमीन दान में दे दी. इस पर एप्रोच पथ बनाने का काम शुरू है़ जो जल्द ही पूरा कर लिया जायेगा़ जून में रखी गयी थी पुल निर्माण की आधारशिला बिस्फी प्रखंड अंतर्गत लालपुर गांव के अजय कुमार चौधरी, बड़े भाई शहीद विश्वंभर चौधरी की प्रेरणा से वर्ष 2012 में पुल निर्माण का सपना देखा, गांव के लोगों के बीच पुल बनाने को लेकर चर्चा शुरू की. किसी ने हां तो किसी ने ना कहा़ कइयों ने पुल निर्माण में आने वाले भारी भरकम खर्च के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास किये जाने को कहा़ श्री चौधरी ने जनप्रतिनिधियों के दरवाजे भी खटखटाये,पर बात नहीं बनी़ फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी, 36 हजार चंदा इकठ्ठा कर पहली बार नदी पर 18 हजार की लागत से चचरी पुल बनवाया़ तीन पंचायत के अधिकांश पंचायती राज के जनप्रतिनिधियों, जिसमें लालपुर के मुखिया नवीन ठाकुर का नाम अव्वल है, उनके सहयोग से घाट पर नाव का परिचालन शुरू हुआ़ परन्तु अंदर ही अंदर पुल निर्माण को लेकर कार्य योजना बनायी जाती रही़ चचरी पुल बनने और नाव परिचालन होने से ग्रामीणों का हौसला बढ़ने लगा़ इसके बाद कौशल किशोर तिवारी की अध्यक्षता में कमला ग्रामीण विकास समिति न्यास का गठन किया गया़ 14 मई 15 को रजिस्ट्रेशन होते ही 14 जून को पुल निर्माण की आधारशिला रखी गयी. 80 लाख की लागत से बनने वाले पुल का एस्टीमेट किसी इंजीनियर ने ही बनाया है, परन्तु पुल का निर्माण जनसहयोग से हुआ है़ नवनिर्मित पुल से इन गांवों को होगा फायदा दुधैल घाट पर स्क्रू पाइल पुल निर्माण होने से नदी के पूरब और पश्चिम के कई गांव एक दूसरे से जुड़ जायेंगे़ नदी के पूरब के लोग कमतौल या दरभंगा आसानी से आ-जा सकते हैं. वहीं पश्चिम के लोग बिस्फी, मधुबनी तक की यात्रा आसानी से कम समय में तय कर सकते हैं. केवटी के खिरमा, मच्चा आदि गांव करीब हो जायेंगे़ चचरी पुल से गुजरने में ग्रामीणों को हर दिन कठिनाई का सामान करना होता था़ चार-पांच महीने बरसात के समय तो जान जोखिम में रहता था़ चचरी पुल व नाव नदी की तेज धारा में बह जाने पर दाल-रोटी का जुगाड़ मुश्किल हो जाता था़ बीमार और लाचार व्यक्ति का समुचित इलाज मुश्किल हो जाता था़ डीह टोल निवासी वहिदुल्लाह, पलटू ठाकुर की मानें तो पुल बन जाने से इन समस्याओं से छुटकारा मिल गया है़ 70 वर्षीय राजेन्द्र सिंह व सदानन्द सिंह के चेहरे पर खुशी की झलक स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है़ भावुक होकर कहते हैं, पुल के लिए ग्रामीणों ने ऐसा कोई दरवाजा नहीं है, जिसे खटखटाया हो़ मगर उन्हें निराशा हाथ लगी़ फिर इनलोगों ने सोचा और बड़े से दिखने वाले काम को अंजाम तक पहुंचाया़ इससे दर्जन भर गांव के करीब डेढ़ लाख लोगों को फायदा होगा़

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