मशरूम की खेती से आगे बढ़ रहे किसान

Published at :26 Jan 2015 10:06 AM (IST)
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मशरूम की खेती से आगे बढ़ रहे किसान

बक्सर : सरकार द्वारा किसानों को पारंपरिक कृषि के साथ-साथ आर्थिक रूप से सबल बनानेवाली कृषि फसलों के उत्पादन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है. किसानों को वैज्ञानिक पद्धति से कृषि कार्य करने के लिए सरकार द्वारा जिले में कृषि विज्ञान केंद्र की नींव डाली गयी है. इस केंद्र द्वारा कृषकों को मशरूम की […]

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बक्सर : सरकार द्वारा किसानों को पारंपरिक कृषि के साथ-साथ आर्थिक रूप से सबल बनानेवाली कृषि फसलों के उत्पादन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है. किसानों को वैज्ञानिक पद्धति से कृषि कार्य करने के लिए सरकार द्वारा जिले में कृषि विज्ञान केंद्र की नींव डाली गयी है. इस केंद्र द्वारा कृषकों को मशरूम की खेती की ट्रेनिंग दी जा रही है. यह एक ऐसी खेती है, जिससे 30 दिनों में ही कमाई शुरू हो जाती है.
इस खेती के लिए न सिंचाई की जरूरत है न खाद की जरूरत और न जुताई न गुड़ाई की. यह एक छोटे से कमरे में शुरू किया जा सकता है. लागत की अपेक्षा फायदा सात से आठ गुना है. कृषि विज्ञान केंद्र के सहयोग से जिले के 40 किसानों ने प्रशिक्षण लेकर ढिंगरी मशरूम की खेती करने में जुट गये हैं. सरकार द्वारा इन किसानों को प्रोत्साहन स्वरूप लागत का 50 प्रतिशत अनुदान दिया जा रहा है.
ढिंगरी मशरूम उगाने की विधि : ढिंगरी मशरूम की खेती अगस्त से अप्रैल माह तक किया जाता है. इसका उत्पादन 20 से 28 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान एवं 80 से 85 प्रतिशत सापेक्षित आद्र्रता पर की जाती है. इसे सेलूलोज युक्त पदार्थ जैसे धान की कुट्टी, गेहूं, जाै, बाजरा मक्के की भूसा, सेम सदृश फसलों की सूखी ठंडलें, गन्ना के खाये पर उगाया जाता है. अनाजों का भूसा सर्वश्रेष्ठ माध्यम है. भूसा को रोगाणु मुक्त बनाने के लिए फफूंदीनाशी वैस्टिन की मात्र को आवश्यकतानुसार स्वच्छ पानी में डाल कर रात्रि में भूसा को गिला कर दिया जाता है. अगली सुबह उसे पानी से निकाल दिया जाता है. अब प्रति किलो गीला भूसे में 40 से 60 ग्राम की दर से मशरूम का बीज स्पॉन मिला कर छिद्रयुक्त पॉलीथिन में दो तिहाई भूसे को भर मुंह बांध दिया जाता है. इन थैलियों को अंधेरे छायादार स्थान जैसे हवादार कमरा, बरामदा, झोंपड़ी आदि में रैक या फर्श पर रख दिया जाता है. लगभग दो से तीन सप्ताह में सफेद कवकजाल पूरे भूसे में फैल जाता है. सफेद कवकजाल उभर जाने के बाद थैलियों को हटा दिया जाता है.
कवकजाल पूर्ण रूप से फैल जाने पर पॉलीथिन हटा कर भूसे के खंडकों को लटका दिया जाता है. पॉलीथिन हटाने के सात से 10 दिनों बाद भूसे के खंड़कों से सीपीनुमा मशरूम निकलने लगता है और पूरी तैयार होने पर उनके किनारे भीतर की ओर मुड़ने लगते हैं या फटने लगते हैं. इस अवस्था में उनके डंठल को ऐंठ या मरोड़ कर तोड़ लिया जाता है. इस तरह सात से 10 दिनों के अंतराल पर डेढ़ माह में दो से तीन बार मशरूम की फसल लेने के बाद भूसे को पशु आहार या खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है.
ढिंगरी की मार्केटिंग : मशरूम को अधिकतर ताजा खाना ही पसंद किया जाता है. ताजे मशरूम में पौष्टिकता एवं खुशबू कायम रहती है. मशरूम बहुत जल्दी ही खराब हो जाता है. अत: अधिक उत्पादन एवं व्यवसाय की सफलता के लिए तत्काल मार्केटिंग अथवा शीघ्र संसाधन जरूरी होता है. आज स्थानीय स्तर पर उत्पादन से ज्यादा खपत हो गया है.
ऐसे करें पैकिंग : ताजा ढिंगरी को डंठल काट कर उसमें लगे तिनके को हटा दिया जाता है. अच्छे स्वस्थ मशरूम को छांट कर 100 गज मोटाईवाले पारदर्शी पॉलीप्रोपेलिन युक्त छिद्रयुक्त थैले में 200 से 250 ग्राम मशरूम भर कर सील बंद कर दिया जाता है. इस मशरूम को चार से पांच दिनों में उपयोग कर लिया जाता है.
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