उपनयन संस्कार सनातन धर्म की ‘तीसरी आंख’, आत्मबोध और संस्कार का प्रतीक : स्वामी चिदात्मन जी महाराज

Published by : Aditya Kumar Ravi Updated At : 22 May 2026 5:30 PM

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उपनयन संस्कार के दौरान की तस्वीर

Nalanda News: जकीय मलमास मेला के आध्यात्मिक वातावरण में स्वामी चिदात्मन जी महाराज उर्फ फलाहारी बाबा के शिविर में उपनयन संस्कार संपन्न हुआ. इस दौरान उन्होंने शिखा और यज्ञोपवीत को सनातन संस्कृति की असली पहचान बताया.

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Nalanda News (रामविलास): राजकीय मलमास मेला के आध्यात्मिक वातावरण में शुक्रवार को सर्व मंगला योग विद्यापीठ, सिमरिया के पीठाधीश्वर स्वामी चिदात्मन जी महाराज उर्फ फलाहारी बाबा के शिविर में उपनयन संस्कार एवं सनातन धर्म की परंपराओं पर विशेष प्रवचन का आयोजन किया गया. इस मांगलिक अवसर पर महाप्रबंधक जगन्नाथ तिवारी के पुत्र आनंद रुद्रशंकर तथा संध्यानंद के पुत्र देवानंद का वैदिक रीति-रिवाज से उपनयन संस्कार संपन्न कराया गया. वैदिक मंत्रोच्चार, हवन और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने इस संस्कार का साक्षी बनकर आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया.

शिखा और यज्ञोपवीत सनातन संस्कृति की पहचान

श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए फलाहारी बाबा ने कहा कि उपनयन संस्कार केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह आत्मजागरण और ज्ञान का द्वार है. उपनयन का वास्तविक अर्थ ‘तीसरी आंख’ से है, जो मनुष्य को सोचने, समझने और सत्य का बोध कराने की दिव्य शक्ति प्रदान करती है. उन्होंने इसके महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मानव शरीर के विभिन्न चक्रों में इसे सर्वोच्च बिंदु माना गया है, और इसी वैज्ञानिक व आध्यात्मिक कारण से सनातन परंपरा में शिखा धारण करने की अनिवार्य व्यवस्था दी गई है. शिखा और यज्ञोपवीत ही सनातन संस्कृति की असली पहचान हैं, किंतु आज पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण के कारण लोग अपनी मूल परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं.

संस्कार, आस्था और अनुशासन से पवित्र बनता है जीवन

स्वामी चिदात्मन जी महाराज ने एक वैज्ञानिक दृष्टांत देते हुए समझाया कि जैसे दो भाग हाइड्रोजन और एक भाग ऑक्सीजन मिलकर जल का निर्माण करते हैं, ठीक उसी प्रकार संस्कार, आस्था और अनुशासन मिलकर मनुष्य के जीवन को पवित्र और सार्थक बनाते हैं. उन्होंने पुरुषोत्तम मास के विशेष धार्मिक महत्व की चर्चा करते हुए कहा कि यह पावन मास प्रत्येक तीन वर्ष पर आता है. हमारे धर्म शास्त्रों में कार्तिक मास में सिमरिया, माघ मास में प्रयागराज तथा वैशाख मास में हरिद्वार में स्नान-ध्यान और कल्पवास के महात्म्य का विस्तृत वर्णन मिलता है.

राजगीर का मलमास मेला दिव्य आध्यात्मिक चेतना का केंद्र

उन्होंने आगे कहा कि सनातन धर्म में छह वर्ष पर अर्धकुंभ और बारह वर्ष पर महाकुंभ की दिव्य परंपरा अनादि काल से निरंतर चली आ रही है. इसी कड़ी में पुरुषोत्तम मास के दौरान राजगीर का मलमास मेला भी दिव्य आध्यात्मिक चेतना का मुख्य केंद्र बन जाता है, जहां इस अवधि में ३३ कोटि देवी-देवताओं का पवित्र आगमन माना जाता है. श्रद्धालुओं के गगनभेदी जयघोष और पूरी तरह भक्तिमय वातावरण के बीच यह विशेष प्रवचन कार्यक्रम संपन्न हुआ.

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