नालंदा बनेगा प्राचीन ज्ञान-संपदा का केंद्र, ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ को मिली बड़ी जिम्मेदारी, शुरू हुआ बड़ा अभियान
प्रतीकात्मक तस्वीर
Bihar Sharif News : ज्ञान भारतम् मिशन: बिहार की छिपी बौद्धिक विरासत को दुनिया के सामने लाएगा नालंदा. मंदिरों और मठों में सुरक्षित दुर्लभ ग्रंथों की तलाश शुरू, नालंदा बना मिशन का केंद्र. नीचे पढ़िए पूरी खबर.
बिहारशरीफ से रामविलास की रिपोर्ट
Bihar Sharif News : भारत की हजारों वर्षों पुरानी ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और बौद्धिक धरोहर को संरक्षित कर उसे वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा शुरू किया गया ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ आज देश के सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अभियानों में शामिल हो चुका है. इस मिशन के अंतर्गत देशभर में मंदिरों, मठों, गुरुद्वारों, मस्जिदों, दरगाहों, पुस्तकालयों तथा निजी संग्रहों में सुरक्षित दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियों का सर्वेक्षण, संरक्षण, डिजिटाइजेशन और सूचीकरण किया जा रहा है. इस महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय परियोजना के तहत संस्कृति मंत्रालय ने नव नालंदा महाविहार, नालंदा को बिहार का क्लस्टर सेंटर बनाया है. महाविहार राज्य के 13 जिलों में फैली अमूल्य पांडुलिपि-संपदा को खोजने और संरक्षित करने का कार्य कर रहा है. इस विषय पर प्रभात खबर के संवाददाता रामविलास ने नव नालंदा महाविहार के कुलपति एवं बिहार क्लस्टर के निदेशक प्रो. सिद्धार्थ सिंह से विशेष बातचीत की.
ज्ञान भारतम् मिशन क्या है और इसकी आवश्यकता क्यों महसूस की गई?
प्रो. सिद्धार्थ सिंह : ज्ञान भारतम् मिशन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शी सोच का परिणाम है. इसका उद्देश्य भारत की हजारों वर्षों पुरानी ज्ञान परंपरा, कला, संस्कृति और सभ्यता को पुनः विश्व मंच पर प्रतिष्ठित करना है. देश के अनेक धार्मिक स्थलों, निजी संग्रहों और पारिवारिक धरोहरों में आज भी ऐसी दुर्लभ पांडुलिपियाँ सुरक्षित हैं, जिनमें अमूल्य ज्ञान निहित है. दुर्भाग्यवश इनमें से अधिकांश सामग्री शोध जगत की पहुंच से बाहर रही है. यह मिशन उन पांडुलिपियों का सर्वेक्षण, सूचीकरण, संरक्षण, डिजिटाइजेशन तथा अनुवाद कर उन्हें समाज और शोध समुदाय तक पहुंचाने का प्रयास है। यह केवल पुराने दस्तावेजों को बचाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की बौद्धिक विरासत को पुनर्जीवित करने का राष्ट्रीय अभियान है.
इस मिशन के प्रमुख आयाम क्या हैं?
प्रो. सिद्धार्थ सिंह : ज्ञान भारतम् मिशन पांच प्रमुख स्तंभों पर आधारित है—पांडुलिपियों का सर्वेक्षण, सूचीकरण, संरक्षण एवं संवर्धन, डिजिटाइजेशन तथा अनुवाद एवं शोध. इन सभी चरणों का उद्देश्य भारत के पारंपरिक ज्ञान को सुरक्षित करना और नई पीढ़ियों तक पहुंचाना है. प्रधानमंत्री द्वारा देशभर में एक करोड़ से अधिक पांडुलिपियों के सर्वेक्षण और सूचीकरण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. यदि यह लक्ष्य पूरा होता है तो यह विश्व का सबसे बड़ा पांडुलिपि संरक्षण एवं दस्तावेजीकरण अभियान सिद्ध होगा. इससे भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक शक्ति का एक विशाल भंडार दुनिया के सामने आएगा.
नव नालंदा महाविहार को बिहार का क्लस्टर सेंटर बनाए जाने को आप किस रूप में देखते हैं?
प्रो. सिद्धार्थ सिंह : यह हमारे लिए गर्व का विषय होने के साथ-साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी है. नव नालंदा महाविहार पिछले 75 वर्षों से भारतीय ज्ञान परंपरा, पालि साहित्य और बौद्ध अध्ययन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है. पालि त्रिपिटक के देवनागरी संस्करण तथा पालि-हिन्दी शब्दकोश जैसे महत्वपूर्ण प्रकाशनों ने संस्थान को राष्ट्रीय पहचान दिलाई है. क्लस्टर सेंटर के रूप में चयन हमारे शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक योगदान की स्वीकृति है. साथ ही यह दायित्व भी देता है कि हम बिहार की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने में अग्रणी भूमिका निभाएं.
अब तक बिहार में कितनी पांडुलिपियों का सर्वेक्षण किया गया है?
प्रो. सिद्धार्थ सिंह : बिहार के 13 जिलों में अब तक लगभग तीन लाख पांडुलिपियों का सर्वेक्षण किया जा चुका है. इस कार्य में महाविहार के 26 शिक्षकों और शोधकर्ताओं की टीम निरंतर लगी हुई है. इनमें से लगभग एक लाख पांडुलिपियों की स्कैनिंग पूरी हो चुकी है। वहीं एक हजार से अधिक पांडुलिपियों का विस्तृत दस्तावेजीकरण किया गया है. डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया भी लगातार आगे बढ़ रही है. इससे इन अमूल्य धरोहरों को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखा जा सकेगा.
क्या सर्वेक्षण के दौरान कोई विशेष दुर्लभ पांडुलिपियां भी मिली हैं?
प्रो. सिद्धार्थ सिंह : निश्चित रूप से। हमारे लिए प्रत्येक पुरानी पांडुलिपि मूल्यवान है. लेकिन कुछ खोजें विशेष महत्व की है। राजगीर के वीरायतन से लगभग 700 अत्यंत दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियां प्राप्त हुई है. लखीसराय में रामचरितमानस की लगभग 700 वर्ष पुरानी पांडुलिपि मिली है, जो अत्यंत महत्वपूर्ण है. इसी प्रकार गया के बीथो शरीफ दरगाह से लगभग 300 वर्ष पुरानी पांडुलिपियों की पहचान हुई है. ये खोजें इस बात का प्रमाण है कि बिहार की धरती आज भी अपने भीतर अपार सांस्कृतिक, साहित्यिक और बौद्धिक संपदा संजोए हुए है.
इन पांडुलिपियों की भाषाएं और लिपियां कैसी हैं?
प्रो. सिद्धार्थ सिंह : सर्वेक्षण में ब्राह्मी, प्राकृत, अर्द्धमागधी, संस्कृत, फारसी, उर्दू तथा विभिन्न लोकभाषाओं में लिखित पांडुलिपियां प्राप्त हुई हैं. इनमें अनेक धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी सामग्री शामिल है. यह विविधता बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, बहुलतावादी परंपरा और ज्ञान-संपन्न इतिहास का प्रमाण है. इन पांडुलिपियों के अध्ययन से समाज, धर्म, साहित्य और संस्कृति के अनेक अनछुए आयाम सामने आएंगे.
प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय से संबंधित कोई पांडुलिपि प्राप्त हुई है?
प्रो. सिद्धार्थ सिंह : दुर्भाग्यवश अभी तक ऐसी कोई पांडुलिपि प्राप्त नहीं हुई है, जिसे सीधे प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय या बिहार के महाविहारों से जोड़ा जा सके। इतिहास में हुए आक्रमणों और विनाश के कारण संभव है कि बड़ी संख्या में मूल पांडुलिपियां नष्ट हो गई हों. यह निस्संदेह पीड़ादायक तथ्य है, लेकिन हम आशावान हैं कि भविष्य में व्यापक खोज और अनुसंधान के दौरान कुछ महत्वपूर्ण सामग्री अवश्य सामने आएगी.
इस मिशन से बिहार की कला, संस्कृति और सभ्यता को क्या लाभ होगा?
प्रो. सिद्धार्थ सिंह : जब ये पांडुलिपियां राष्ट्रीय डिजिटल पोर्टल पर उपलब्ध होंगी, तब देश-विदेश के शोधकर्ताओं को बिहार की लोक परंपराओं, धार्मिक विचारों, साहित्यिक धरोहरों और सांस्कृतिक इतिहास का अध्ययन करने का अवसर मिलेगा. ज्ञान भारतम् मिशन बिहार की सांस्कृतिक विरासत को केवल संरक्षित ही नहीं करेगा, बल्कि उसे वैश्विक मंच पर नई पहचान भी दिलाएगा. यह बिहार के गौरवशाली अतीत और भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को पुनः स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और दूरगामी कदम सिद्ध होगा. भारत की बौद्धिक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने में यह मिशन मील का पत्थर साबित होगा.
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