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जल श्रमिक संघ व गंगा मुक्ति आंदोलन के सदस्य का जल सत्याग्रह

Updated at : 21 Oct 2024 12:45 AM (IST)
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जल श्रमिक संघ व गंगा मुक्ति आंदोलन के सदस्य का जल सत्याग्रह

जल श्रमिक संघ व गंगा मुक्ति आंदोलन बिहार प्रदेश मत्स्य जीवी जल श्रमिक संघ के बैनर तले कागजी टोला के मछुआरों ने जल सत्याग्रह आंदोलन चला कोवा नदी में अवैध रूप से जलकर माफियाओं के घेराबाड़ी को हटाने की शुरुआत कर दी

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जल श्रमिक संघ व गंगा मुक्ति आंदोलन बिहार प्रदेश मत्स्य जीवी जल श्रमिक संघ के बैनर तले कागजी टोला के मछुआरों ने जल सत्याग्रह आंदोलन चला कोवा नदी में अवैध रूप से जलकर माफियाओं के घेराबाड़ी को हटाने की शुरुआत कर दी है. कार्यक्रम का शुरुआत कहलगांव के कालीघाट से शुरू की गयी. कोवा नदी में करीब पांच किलोमीटर के भीतर जल सत्याग्रह के तहत तीन जगहों पर घेराबाड़ी समाप्त कराया. सभा में गंगा मुक्ति आंदोलन के कन्वेयर योगेंद्र साहनी ने कहा कि घेराबाड़ी में छोटी-छोटी मछलियां थी. उनका गंगा नदी में आना शुरू हुआ, लेकिन इस तरह का कार्यक्रम मत्स्य विभाग व वन विभाग की ओर से होना चाहिए था. दोनों विभाग की उदासीनता से नदियों में खुलेआम घेराबाड़ी लगता है, जिससे गंगा नदी में लगातार मछलियों की संख्या घट रही है. बड़ी-बड़ी मछलियों का पहले से ही आना बंद हो गया. जो भी गंगा में मछलियां बची है, उसे वन विभाग और मत्स्य विभाग समाप्त करने पर तुला है. मत्स्य विभाग, वन विभाग, पुलिस, सरकार को कोई चिंता नहीं है कि डॉल्फिन व मछुआरों की जीविका कैसे बचेगी.

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गंगा मुक्ति आंदोलन की 1982 से हुई शुरुआत : भागलपुर जिले में सुल्तानगंज से पीरपैंती पीर दरगाह तक 80 किलोमीटर में महेश घोष व मुशर्रफ प्रमाणिक हुसैन की जमींदारी थी. जमींदार मछुआरों से हर जल पर टैक्स लेते थे. हर नाव से जमींदारों की ओर से टैक्स वसूला जाता था .पूरे बिहार में भागलपुर छोड़ कर को-ऑपरेटिव सोसाइटी के हाथों में जलकर था. इस जमींदारी प्रथा के खिलाफ 1982 में गंगा मुक्ति आंदोलन और जल श्रमिक संघ ने आंदोलन शुरू किया. 1982 से 1990 तक जमींदारों के खिलाफ मछुआरा समुदाय के संघर्ष में कई मछुआरों की हत्या हुई. 1987 में 13 मछुआरों की हत्या हुई. इस संघर्ष के बाद मछुआरों ने जमींदारों को टैक्स देना बंद कर दिया. 1991 में सभी परंपरागत मछुआरों को नदियों में निशुल्क शिकार के लिए परिचय पत्र, घेराबाड़ी के अलावा नदियों में विस्फोटक पदार्थ या जहरीली गैस पर भी प्रतिबंध लगाया गया.

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जाल लगाने से गंगा की जैव विविधता पर प्रभाव पड़ता है. छोटी मछलियां डॉल्फिन का प्रमुख भोजन है छोटी मछलियां नहीं रहने से डॉल्फिन मर जायेगी. डॉल्फिन राष्ट्रीय जलीय जीव है. यह प्रदूषण रहित जगह पर रहती है. इसकी संख्या नदी में काफी कम है. डॉल्फिन व हर तरह के छोटे-बड़े जीव पानी में रहने से इकोसिस्टम बना रहता है. अगर यह सारे जीव पानी में नहीं रहे, तो गंगा का जैव विविधता सिस्टम खत्म हो जायेगा.

प्रो डीएन चौधरी, टीएमबीयू.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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