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बोध नवमी कलश स्थापना के साथ पूजा का हुआ आगाज

Updated at : 26 Sep 2024 8:25 PM (IST)
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बोध नवमी कलश स्थापना के साथ पूजा का हुआ आगाज

सिंहनान गांव के दुर्गा मंदिर का इतिहास करीब 250 वर्ष पुराना है.

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– सिंहनान दुर्गा मंदिर में बांग्ला विधि से होती है पूजा अर्चना बांका/रजौन. बांका जिले के उत्तरी सीमा क्षेत्र व चांदन नदी किनारे स्थित सिंहनान गांव के दुर्गा मंदिर का इतिहास करीब 250 वर्ष पुराना है. कायस्थ समाज के लोगों द्वारा बांगला पद्धति से पूजा अर्चना की जा रही है. इस मंदिर के प्रति लोगों का यह आस्था है कि जो भी भक्त श्रद्धा भक्ति से मन्नत मांगता हैं उसकी मुरादे अवश्य पूरी होती है. इसी अटूट आस्था और विश्वास के भरोसे देश के विभिन्न इलाकों में जीवन यापन को लेकर रहने वाले ग्रामीण दुर्गा पूजा के मौके पर अपने घर वापस लौट आते हैं. गांव के लोगों को बेसब्री से नवरात्रा पर्व का इंतजार रहता हैं और इसी मौके पर अपने गांव घर से बाहर रहने वाले ग्रामीण मां दुर्गा की पूजा करने के साथ-साथ अपने घर परिवार के साथ- साथ मित्रों से मिलते हैं.

250 वर्ष पुराना है इतिहास

सिंहनान गांव में मूल मंदिर की स्थापना स्व. चोवालाल दत्ता ” ने वर्ष 1855 के आस-पास की थी. पिण्डी पर मां का श्रृंगार (सिंदूर स्वरूप प्रतीक) 250 वर्ष पुराना है. जहां आज भी राढ़ी कायस्थ समाज के सातवें वंशज एवं ग्रामीण इस परंपरा का निर्वाह पुरी श्रद्धा एवं भक्ति के साथ करते आ रहे हैं.

बांग्ला विधि से होती है पूजा

वैसे तो हिंदूधर्म में नवरात्र एवं दुर्गा पूजा का विशेष महत्व है. सामान्य तौर पर दुर्गा पूजा के प्रथम दिन कलश स्थापना कर पूजा अर्चना प्रारंभ की जाती है, लेकिन सिंहनान गांव के दुर्गा मंदिर में बांग्ला विधि से पूजा अर्चना की जाती है. प्रथम दिन से 6 दिन पूर्व ही बोधन नवमी के दिन कलश स्थापना करने की परंपरा के अनुसार पुरोहित शंभू झा द्वारा चांदन नदी में कलश की पूजा की गयी और माता के प्रतीक स्वरूप कलश को मंदिर लाया गया. इस दौरान मौके पर नौ कौड़ी भी लुटाया गया.

कहते हैं मेढ़पति परिवार के लोग

मेढ़पति परिवार के जितेंद्र शेखर दत्ता बताते हैं कि उनके पूर्वज स्व. चोवा लाल दत्ता ने अपने पुराने मंदिर के सिंदूर स्वरूप सिंगार को वर्ष 1855 में दुर्गा पूजा के पूर्व सिंहनान लाकर स्थापित कर पूजा अर्चना प्रारंभ किया, जो पिछले सात पीढ़ी से अनवरत हो रहा है. इस संबंध में यह उल्लेखित है कि बंगाल से 15वीं शताब्दी में दिल्ली के बादशाह ने टक दत्त को कानूनगो नियुक्त कर भेजा, जिन्होंने अमरपुर के पास मुख्यालय बनाया, जो दत्तवाडी के नाम से भी जाना जाता है. यह स्थान वर्तमान में डुमरामा कहलाता है. टक दत्त के वंशज लश्कर दत्त भी कानूनगो हुए. राजस्व वसूली को लेकर कालांतर में बीरमां में निवास करने लगे और मंदिर में कुलदेवी की पूजा भी करने लगे. लेकिन बाढ़ की समस्या एवं यातायात सुविधा को लेकर सिंहनान में बस गये. इस मंदिर से लाया गया श्रृंगार की पूजा अभी तक की जाती है. यहां एक पूजा से लगातार दीपक जलता है.

चिराग उठा कर घर ले जाने की है परंपरा

दशमी को सूर्योदय से पहले चिराग को उठाकर लोग अपने-अपने घर ले जाते हैं. रात में भोग लगाने के उपरांत महिलाओं के द्वारा मां दुर्गा का गलसेदी किया जाता हैं और फिर ग्रामीण अपने कंधे पर मेड़ को चांदन नदी ले जाकर प्रतिमा विसर्जित करते हैं.

पूजा कमेटी में सक्रिय सदस्य

सिंहनान गांव में देवी दुर्गा की पूजा शांतिपूर्ण संपन्न कराने के लिए यहां कायस्थ समाज के सदस्यों की कमेटी सक्रिय भूमिका निभाती है. जिसमें संरक्षक के रूप में जग नारायण दत्ता, अध्यक्ष मनोज कुमार घोष एवं सचिव संजय कुमार दत्ता हैं.

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