वीरान हो चुका है चिलकावर पहाड़ स्थित ऐतिहासिक सरस्वती मंदिर

Published at :03 Feb 2016 5:28 AM (IST)
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वीरान हो चुका है चिलकावर पहाड़ स्थित ऐतिहासिक सरस्वती मंदिर

2007 तक धूमधाम से यहां होती थी मां सरस्वती की पूजा बांका : जिला मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर की दूर चिलकावर पहाड़ी पर स्थित ऐतिहासिक सरस्वती मंदिर में पिछले आठ सालों से पूजा अर्चना नहीं हो पा रही है. वर्ष 1954 में स्थानीय छात्रों एवं बुद्धिजीवियों के सहयोग से प्राचार्य परमेश्वर झा द्वारा इस […]

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2007 तक धूमधाम से यहां होती थी मां सरस्वती की पूजा

बांका : जिला मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर की दूर चिलकावर पहाड़ी पर स्थित ऐतिहासिक सरस्वती मंदिर में पिछले आठ सालों से पूजा अर्चना नहीं हो पा रही है. वर्ष 1954 में स्थानीय छात्रों एवं बुद्धिजीवियों के सहयोग से प्राचार्य परमेश्वर झा द्वारा इस मंदिर की स्थापना की गयी थी. वर्ष 2007 तक मां सरस्वती की पूजा अर्चना बड़ी ही धूम-धाम से आयोजित होती रही.
सरस्वती पूजा के अवसर पर यहां मेला भी लगता रहा. लेकिन वर्ष 2007 के बाद से जब पहाड़ की खुदाई आरंभ हुई तो मंदिर जाने का रास्ता अवरुद्ध हो गया. साथ ही पत्थर माफियाओं के आतंक से भी लोग इस मंदिर की तरफ देखने से परहेज करने लगे. लिहाजा मंदिर वीरान हो गया और यहां पूजा अर्चना भी बंद हो गयी. इसका कारण यह है कि खनन विभाग ने पहाड़ को स्थानीय लोगों के हाथ में लीज पर दे दिया. जिसके बाद पहाड़ की खुदाई होना आरंभ हो गयी.
खुदाई होते- होते मंदिर जाने का रास्ता भी बंद होने लगा तब स्थानीय लोगों ने विरोध करते हुए कोर्ट में केश कर दिया. लेकिन इस कार्य पर रोक लगते-लगते सरस्वती मंदिर तक खुदाई पहुंच चुकी था. पहाड़ की खुदाई होने के बाद 2007 से इस मंदिर में लोग पूजा अर्चना करने के लिए भी नहीं पहुंचने लगे.
वर्ष 2007 तक हुई पूजा अर्चना :
1954 से 2007 तक इस पहाड़ पर वसंत पंचमी में भव्य मेला का आयोजन होता रहा. सरकारी स्तर पर कई बार इस स्थान पर मीना बाजार भी लगवाया गया था. जिसका उद्घाटन करने के लिए दिल्ली से विशेष टीम पहुंची थी. उस वक्त यहां दिन रात लोगों की भीड़ लगी रहती थी. पहाड़ व इसकी तराई में दुकानें सजी रहती थी. साथ ही शरद पूर्णिमा की रात आसपास के गांव से गाय का दूध मंगा कर खीर बनाया जाता था.
रात में खीर को पहाड़ स्थित मां शारदे के मंदिर व बाहर में सजा कर रखा जाता था. सुबह में उस खीर को ग्रामीणों के बीच प्रसाद के रूप में वितरण किया जाता था. लेकिन 2007 के बाद पहाड़ का लीज होने के बाद यहां की स्थिति बदल गयी. अब लोग इस मंदिर को देख कर गुजरे हुए जमाने को बस याद भर कर लेते हैं.
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