सैकड़ों वर्ष पुराना है कुशेश्वरनाथ धाम का इतिहास

Published at :05 Aug 2015 4:36 AM (IST)
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सैकड़ों वर्ष पुराना है कुशेश्वरनाथ धाम का इतिहास

बांका :जिले के बाराहाट प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत लबोखर गांव के करीब प्रसिद्ध पौराणिक कुशेश्वर नाथ महादेव का मंदिर स्थित है. ऐसी मान्यता है कि इस शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही मनुष्य का दुख दूर हो जाता है. इसका इतिहास भी सैकड़ों वर्ष पुराना कई पीढ़ी से ग्वाला समुदाय के लोग कुशेश्वर नाथ के पुजारी […]

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बांका :जिले के बाराहाट प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत लबोखर गांव के करीब प्रसिद्ध पौराणिक कुशेश्वर नाथ महादेव का मंदिर स्थित है. ऐसी मान्यता है कि इस शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही मनुष्य का दुख दूर हो जाता है. इसका इतिहास भी सैकड़ों वर्ष पुराना कई पीढ़ी से ग्वाला समुदाय के लोग कुशेश्वर नाथ के पुजारी होते है. वर्तमान पुजारी कापरी ने बताया कि यहां की किवदंति प्रसिद्ध है. कथा के मुताबिक यहां पहले जंगल था.

वहीं लबोखर गांव वासी एक ग्वाला पशुपालक को अनेक गाय एवं भैंस थी. एक गाय हमेशा झुंड से अलग होकर कहीं गुम हो जाती थी. ग्वाले ने गांव वाले के साथ मिलकर गाय का पीछा किया. सच्चाई जानकार सभी आश्चर्यकित हो गये. यह गाय अपने थन से जंगल में स्थित कुश के घास वाली जगह पर दूध गिरा रही थी. इसी कारण इस महादेव का नाम भी कुशेश्वर महादेव पड़ा. यह महादेव मंदिर आज अंग क्षेत्र का प्रसिद्ध शिव मंदिर बन गया है.

धाम की महिमा अपरंपार
इसकी मान्यता के बारे में ग्रामीणों ने बताया कि इस शिव मंदिर का निर्माण सैकड़ों वर्ष पूर्व डयोढ़ि के जर्मीदार द्वारा कराया गया था. ब्राrाणों ने उस जमींदार से मिल कर एक ग्वाला द्वारा पूजा करने पर अपनी आपत्ति जतायी थी. ब्राrाण द्वारा यहां पूजा के प्रयास के दौरान मंदिर का बंद फाटक तक नहीं खुल पाया था, तभी से ग्वाला ही पुजारी बने हुए हैं. पुजारी के पूर्वजों ने भगवान से विनती कर वरदान मांगे थे. उस समय स्वपन में भगवान ने कहा था कि रविवार को नेम निष्ठा के साथ दिन भर में जितनी रस्सी का गेंठा बना पाओगे उतने ही फल मिलेंगे.
इस संबंध में प्रेमलाल, सच्चिदानंद झा ने बताया कि लबोखर धाम की महिमा अपरंपार है. उनकी मनोकामना पूर्ण होने पर वे साल भर मंदिर में प्रत्येक दिन ज्योति दीपक जला रहे हैं. भक्त सावन माह के प्रत्येक सोमवारी को भागलपुर स्थित विभिन्न घाटों से गंगा जल भर कर डाक कांवरिया बाबा पर जल चढ़ाते हैं.
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