नि:शक्त अर्चना ने पदकों की लगा दी बौछार
अजय झा, पंजवारा हिंदी फिल्म का मशहूर गाना झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए की एक बेजोड़ मिसाल क्षेत्र के पंजवारा पंचायत में देखने को मिलता है. यहां की एक नि:शक्त बेटी ने अपनी नि:शक्ता के बाद भी अपने बुलंद हौसले की बदौलत पैराओलंपिक में पदकों की बौछार लगा दी. पंजवारा पंचायत के नगरी गांव […]
अजय झा, पंजवारा
हिंदी फिल्म का मशहूर गाना झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए की एक बेजोड़ मिसाल क्षेत्र के पंजवारा पंचायत में देखने को मिलता है. यहां की एक नि:शक्त बेटी ने अपनी नि:शक्ता के बाद भी अपने बुलंद हौसले की बदौलत पैराओलंपिक में पदकों की बौछार लगा दी.
पंजवारा पंचायत के नगरी गांव की एक गरीब परिवार में पली बढ़ी अर्चना कुमारी ने नि:शक्त होने के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक अलग पहचान बनायी है. अर्चना ने अपनी जिंदगी में कभी हार नहीं मानी और आगे ही बढ़ती चली. अर्चना बचपन में ही छत से गिर पड़ी और दोनो पैरों से अपंग हो गयी. पटना के एक डॉक्टर ने इलाज के दौरान अर्चना को भारी पत्थर उठा कर फेकने की सलाह दी थी. अर्चना ने डॉक्टर की सलाह मान कर वैसा ही व्यायाम शुरू कर दिया, लेकिन इस सफलता से अचानक डॉक्टर के दिमाग में एक युक्ति समझ में आयी और उन्होंने अर्चना को एक सलाह दी कि तुम पटना में आयोजित पैरा ओलंपिक खेल में भाग लेकर अपना नाम रोशन कर सकती हो. उसने ऐसा ही किया. यहीं नये सफर की शुरूआत हुई. अर्चना ने पटना में इस खेल में भाग लेकर पदक जीता.
इसके बाद जयपुर में आयोजित राष्ट्रीय पैराओलंपिक में डिस्कस थ्रो में गोल्ड मैडल जीता. फिर उसने पीछे मुड़ कर कभी नहीं देखा. बाद में वर्ष 2010 में हरियाणा के पंचकुला में हुए राष्ट्रीय पैराओलंपिक में शॉटकट व डिस्कस में सिल्वर और ज्वेलियन थ्रो में कांस्य पदक जीता. फिर बाद में 2012 में बेंगलूर में आयोजित राष्ट्रीय पैराओलंपिक में शॉटपूट में कास्य पदक जीता और देखते ही देखते इस तरह के पदकों की बौछार लगा दी. इतने सारे इनाम जीतने के बाद भी आज यह खिलाड़ी एक अदद सरकारी कुरसी के लिये तरस रही है.
अर्चना को 29 अगस्त 2012 को कला सांस्कृ तिक राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से नवाजा. इन सबके बीच कुछ दिन बाद जिला में फुटबॉल का महाकुं भ होने को लेकर यहां के खेल प्रेमी खिलाड़ियों के लिये पलक फावड़े बिछाये हुए हैं जबकि एक लाचार खिलाड़ी एक अदद सरकारी ट्राइ साइकिल के लिये तरस रही है.
अर्चना बताती है की वो बीए की पढ़ाई के लिये टूटी ट्राइ साइकिल से ही अपनी जरूरत किसी तरह पूरी कर रही है. उसका विदेश में खेलने के सपने को लेकर वीजा भी बन कर तैयार है लेकिन दो लाख रुपये की खातिर सब कु छ यूं ही पड़ा हुआ है. काश की इस मेहनत कश और होनहार महिला खिलाड़ी को कोई मदद के लिये आगे आता.अर्चना का बस एक ही ख्वाब है की विदेशी सरजमी पर वो तिरंगा लहरा कर देश का नाम रोशन करे. अर्चना ने अपनी जिंदगी का मूल मंत्र बताते हुए कहा जिंदगी में कोई काम असंभव नहीं है. बस एक संकल्प की जरूरत है.
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