स्वतंत्रता सेनानियों की धरती रही है कुटुंबा
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 24 Jan 2014 2:37 AM
– विश्वनाथ पांडेय – देश को आजादी दिलाने में हंसते-हंसते दी जान कुटुंबा : आजादी की लड़ाई लड़ने व अंगरेजों को भारत से भगाने और स्वराज्य स्थापित करने के लिए देशभक्तों ने सौंगध खायी थी. इसके लिए स्वतंत्रता सेनानियों को कई यातनाएं दी गयी. इतना ही नहीं अंगरेजों के विरोध में बात करने वाले लोगों […]
– विश्वनाथ पांडेय –
देश को आजादी दिलाने में हंसते-हंसते दी जान
कुटुंबा : आजादी की लड़ाई लड़ने व अंगरेजों को भारत से भगाने और स्वराज्य स्थापित करने के लिए देशभक्तों ने सौंगध खायी थी. इसके लिए स्वतंत्रता सेनानियों को कई यातनाएं दी गयी. इतना ही नहीं अंगरेजों के विरोध में बात करने वाले लोगों की सारी संपत्ति लूट कर घर में आग लगा दी जाती थी.
असंख्य क्रांति पुत्रों ने भारत माता को गुलामी की जंजीर से मुक्ति दिलाने के लिए अपने प्राण की आहूति दी. उन्हें अपने जीवन से आजादी अधिक प्यारी थी. कुछ क्रांतिकारी महात्मा गांधी के नेतृत्व में एकजुट थे तो कुछ सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में अंगरेजों के ठिकानों को ध्वस्त करने में लगे थे.
वीरों ने निभायी भूमिका
प्रखंड क्षेत्र के वीर सपूतों ने आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभायी थी. करमडीह निवासी ब्रह्मदेव सिंह की बात करें या फिर गोड़ियार पर के सीताराम आजाद का. कृषक पुत्र ब्रह्मदेव सिंह स्वतंत्रता के लिए संकल्पित थे. 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह में इनकी भूमिका अहम रही.
इस दरम्यान 22 अगस्त को उनकी गिरफ्तारी हुई और उनका घर भी जला दिया गया. इन पर कई तरह के मुकदमा चला कर 20 वर्ष की सजा सुनायी गयी. 1943 में इनकी मृत्यु भी हो गयी. सीताराम आजाद को हरिहरगंज थाने पर तिरंगा फहराने व महाराजगंज कलाली जलाने को लेकर पुलिस ने इनका भी घर जला दिया था.
बलेश्वर महतो ने तिरंगा फहराने, सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक सत्याग्रह व विदेशी कपड़े के बहिष्कार करने का नेतृत्व किया था. इन्हीं के निर्देश पर इसी गांव के रामधनी महतो, केवल महतो, गोपी महतो, मुंगेश्वर चंद्रवंशी, प्रताप महतो, दीपा महतो, फुलमति देवी, बेचन महतो ने स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई लड़ी और दो-दो वर्ष के सजा भी काटे.
सरडीहा निवासी उमेश्वरी चरण, उरदाना के बिगन मिश्र, 1930 के सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया था. सुखदेव सिंह बड़कागांव व केशव सिंह बेदौलिया ने विदेशी कपड़ा बहिष्कार में भूमिका निभायी थी. लभरी निवासी मुरलीधर सिंह व भटकुर निवासी रामजन्म सिंह, रामकेवल सिंह, राम किशुन राय व साड़ी निवासी दुर्योधन चौधरी इसी कड़ी में अहम भूमिका निभाये और अगस्त क्रांति में भाग लिया.
कुटुंबा के छठु तिवारी स्वतंत्रता सेनानियों को आश्रय देते थे. देशपुर के रामचंद्र सिंह व रामनरेश सिंह भी स्वतंत्रता की लड़ाई में प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया. रामानंदन सिंह व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया.
सड़सा निवासी बटुक सिंह सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया व इसके लिए इन्हें सजा भी हुई. बलिया निवासी बसंत सिंह गांधी जी के करो या मरो के आह्वान पर अगस्त क्रांति में भाग लिया. अंबा निवासी रामनरेश सिंह, गंगा नारायणन मेमोरियल हाइस्कूल में नेता सुभाष चंद्र बोस को माल्यार्पण किया व उनका साथ दिया.
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