लापरवाही के नाम पर कब तक मरती रहेंगी उजाला प्रवीण जैसी प्रसूताएं, प्रसूता व नवजात की मौत का जिम्मेदार कौन?
Updated at : 18 Mar 2019 2:15 AM (IST)
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नवजात को गोद में ले उनकी सांसों की डोर तलाशते रहे परिजन, लेकिन आखिर हो गयी उसकी भी मौत, आखिर क्यों बंद थी आइसीयू कहां गयी थीं रोस्टर पर तैनात एएनएम व चिकित्सा कर्मी, आखिर क्यों नहीं अपनी जिम्मेदारी समझते हैं चिकित्सक चीख-चीख कर अपनी पत्नी व नवजात के मौत पर पूछता रहा पीड़ित पति […]
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- नवजात को गोद में ले उनकी सांसों की डोर तलाशते रहे परिजन, लेकिन आखिर हो गयी उसकी भी मौत, आखिर क्यों बंद थी आइसीयू
- कहां गयी थीं रोस्टर पर तैनात एएनएम व चिकित्सा कर्मी, आखिर क्यों नहीं अपनी जिम्मेदारी समझते हैं चिकित्सक
- चीख-चीख कर अपनी पत्नी व नवजात के मौत पर पूछता रहा पीड़ित पति जिसवान
मृगेंद्र मणि सिंह, अररिया : एक साथ दो मौतों का जिम्मेवार कौन है. यह सवाल अब तेजी से लोगों के जुबान पर आ रहा है. भले ही कुछ लम्हों तक ऐसा लग रहा है कि लोगों का आक्रोश थम गया है. लेकिन आक्रोश अभी भी है, जो कभी भी उबाल लेकर बाहर निकल सकता है. ऐसे में स्वास्थ्य विभाग को अपनी जिम्मेवारी समझनी होगी.
उन्हें यह कह कर कि लापरवाही के कारण मौत हुई है. यह अब चलने वाला नहीं है. पहली बार प्रसव कराने पहुंची उजाला प्रवीण को 03 बजे उसके परिजनों ने सदर अस्पताल में भरती कराया. भरती के बाद मौल-भाव हुआ.
परिजनों की मानें तो 05 हजार रुपये मांगे गये. देने का आश्वासन भी परिजनों ने दिया. लेकिन पुन: फिर क्या हुआ कि पहली बार मां बनने जा रही उजाला अपने बच्चे का मूंह भी न देख पायी.
यही नहीं वह नवजात भी जब तक मां के दूध का मतलब समझ पाता, अस्पतालों के चक्कर काटते-काटते ही दुनिया से विदा हो गया. यह कैसा सिस्टम स्वास्थ्य के नाम पर लाखों खर्च करने के बाद न तो सुरक्षित प्रसव हो पाता है. न ही प्रसव कराने वाले स्वास्थ्य कर्मी ही अपने दायित्व को समझ पाते हैं.
मृतिका के परिजनों ने कहा कि यहां पर काम करने वाले चिकित्सक हो या एएनएम कोई भी रोस्टर का पालन नहीं करता है. कहा तो यह भी गया कि लाखों रुपये का पारिश्रमिक पाने वाले बड़े नाम भी अपने दायित्वों से बचते फिरते हैं. ऐसे में स्वास्थ्य विभाग लापरवाही के नाम पर आखिर कब तक जिंदगी का मजाक उड़ाते रहेंगे.
आखिर कब तक मरती रहेंगी उजाला और बात फाइलों में ही दबती रहेगी. सवाल उठना लाजिमी है कि सदर अस्पताल में आइसीयू वार्ड बना हुआ है. लेकिन उक्त वार्ड में ताला लगा हुआ था.
काश अगर आइसीयू खुला होता तो वह नवजात तो इस दुनियां में अपना कदम रख पाता. हालांकि पूरे मामले को एसडीओ, एसडीपीओ, सीओ व नगर थानाध्यक्ष ने अपने नजरों के सामने होता देखा. परिजनों का आक्रोश भी देखा. लेकिन आक्रोश के पीछे के दर्द का जबाव कोई नहीं दे पाया.
बिना चिकित्सक के संचालित होता है प्रसव वार्ड
भले ही सदर अस्पताल के प्रसव वार्ड को लक्ष्य प्रसव वार्ड बनाने की कवायद चल रही है, लेकिन हकीकत यह है कि सदर अस्पताल का प्रसव वार्ड बिना चिकित्सक के ही संचालित हो रहा है.
जबकि सदर अस्पताल में रोजाना 20 से अधिक महिलाओं का प्रसव होता है. प्रसूताओं का प्रसव यहां सदर अस्पताल के एनएम के द्वारा ही किया जाता है. जानकारी के अनुसार सदर अस्पताल में ओपीडी के समय चार से पांच चिकित्सक रहते हैं.
जबकि आपातकाल के समय एक ही चिकित्सक रहते हैं. आपातकाल में उपस्थित चिकित्सक को ही पोस्टमार्टम से लेकर आपातकाल मरीज व प्रसव वार्ड को भी देखना पड़ता है. ऐसे में एनएम लोगों को खुद ही प्रसव कराना पड़ता है. सदर अस्पताल के एनएम के मानें तो जब तक सदर अस्पताल के प्रसव वार्ड में एक चिकित्सक को प्रतिनियुक्त नहीं की जाती है. तब तक प्रसव अब हम लोग नहीं करा पायेंगे.
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