आचार्य विद्यासागर जी महाराज को जैन समाज के लोगों ने ऐसे दी श्रद्धांजलि

संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज के समतापूर्वक समाधि मरण के उपरांत मधुबन स्थित गुणायतन संस्था में भावपूर्ण विनयांजलि सभा का आयोजन रविवार को किया गया
संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज के समतापूर्वक समाधि मरण के उपरांत झारखंड राज्य में गिरिडीह जिला के मधुबन स्थित गुणायतन संस्था में भावपूर्ण विनयांजलि सभा का आयोजन रविवार को किया गया. सभा में श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उनके संदेशों को जीवन में उतारने का संकल्प लिया. बताते चलें कि संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज काे बीते 18 फरवरी को डोंगरगढ़ स्थित चंद्रगिरी तीर्थ में समाधि मरण प्राप्त हुआ था.
- संत शिरोमणि के समतापूर्वक समाधि मरण पर मधुबन की गुणायतन संस्था में भावपूर्ण विनयांजलि सभा
- आचार्यश्री के चित्र पर पुष्प अर्पित कर जैन समाज के लोगों ने उनके संदेशों को जीवन में उतारने का लिया संकल्प
- 18 फरवरी को डोंगरगढ़ स्थित चंद्रगिरी तीर्थ में समाधि मरण को प्राप्त हुए थे महाराज
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सम्मेद शिखर से आचार्य विद्यासागर जी का रहा पुराना संबंध
गुरुदेव का सम्मेद शिखर जी से भी पुराना संबंध रहा था. महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि प्रमाण सागर जी महाराज के सान्निध्य में मधुबन में भव्य गुणायतन संस्था व मंदिर का निर्माण किया जा रहा है. विनयांजलि सभा की शुरुआत आचार्यश्री के चित्र पर दीप प्रज्वलन तथा पुष्प अर्पित करने के साथ हुई. इस दौरान वक्ताओं व साधु-संतों द्वारा आचार्यश्री के जीवन चरित्र का वर्णन किया गया तथा उनके गुणों व संदेशों को आत्मसात करने का संकल्प लिया गया.
वर्ष 1983 में सम्मेद शिखर जी आये थे आचार्यश्री
महान तीर्थंकरों की श्रेष्ठतम परंपराओं को अपने जीवन में साक्षात करने वाले जैन धर्म के महान आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने 1968 में दिगंबरी दीक्षा ली थी और तब से निरंतर सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य की साधना करते हुए इन पंच महाव्रतों के देशव्यापी प्रचार के लिए समर्पित हो गये.
महाराज ने अपने जीवन में सैकड़ों मुनियों एवं आर्यिकाओं को दीक्षा दी
लोक कल्याण की भावना से अनुप्राणित होकर पूज्य आचार्य महाराज ने अपने जीवन में सैकड़ों मुनियों एवं आर्यिकाओं को दीक्षा प्रदान की और लोकोपकारी कार्यों के लिए सदैव अपनी प्रेरणा और आशीर्वाद प्रदान किया. आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज सन 1983 में सम्मेद शिखर आये थे. लगभग दो माह तक मधुबन में रुकने के बाद इसरी के लिए विहार कर गये थे. इसरी में आचार्यश्री ने एक चातुर्मास किया था.
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By Mithilesh Jha
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