#NationalSportsDay : जानें ध्यान सिंह कैसे बने ध्यानचंद

Published at :29 Aug 2017 11:29 AM (IST)
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#NationalSportsDay : जानें ध्यान सिंह कैसे बने ध्यानचंद

आज हॉकी के जादूगर ध्यानचंद की जयंती है. उन्हें सम्मान देने के लिए आज के दिन को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है. आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहराज्यमंत्री किरण रिजिजू और खेल मंत्री विजय गोयल ने उन्हें श्रद्धाजंलि अर्पित की. आज राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद कई खिलाड़ियों को सम्मानित भी करेंगे, जिनमें झारखंड […]

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आज हॉकी के जादूगर ध्यानचंद की जयंती है. उन्हें सम्मान देने के लिए आज के दिन को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है. आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहराज्यमंत्री किरण रिजिजू और खेल मंत्री विजय गोयल ने उन्हें श्रद्धाजंलि अर्पित की. आज राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद कई खिलाड़ियों को सम्मानित भी करेंगे, जिनमें झारखंड की सुमराई टेटे का नाम भी शामिल है. टेटे को ध्यानचंद आज ध्यानचंद पुरस्कार दिया जायेगा. ध्यानचंद को विश्व हॉकी का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी माना जाता है. मैदानी गोल करने में उनका कोई सानी नहीं होता था.

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ध्यानचंद के बारे में कहा जाता है कि एक बार अगर गेंद उनके हॉकी स्टिक से लग जाती थी, तो उसे छिनना उनके विपक्षियों के लिए टेढ़ी खीर हो जाता था. कहा जाता है कि उनके गोल कमाल के होते थे. ध्यानचंद ने देश को 1928, 1932 और 1936 में स्वर्ण पदक दिलाया था. कहा जाता है कि विदेश में एक बार उनके स्टिक की जांच भी की गयी थी कि आखिर उनके स्टिक में ऐसी क्या बात है कि एक बार साथ मिलने के बाद गेंद से अलग होती ही नहीं.

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ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 में इलाहाबाद में हुआ था. उन्होंने अपने कैरियर में 400 से अधिक गोल किये. उनके पिता ब्रिटिश आर्मी में थे. ध्यानचंद को बचपन से हॉकी खेलने का शौक नहीं था, वे कुश्ती के शौकीन थे. मात्र 16 वर्ष की उम्र में ध्यानचंद ने आर्मी ज्वाइन किया था. आर्मी ज्वाइंन करने के बाद ही ध्यान सिंह ने हॉकी खेलना शुरू किया. वे रात-रात को प्रैक्टिस करते थे.चंद का हिंदी अर्थ चांद होता है, चूंकि वे रात को खेलते थे, इसलिए उनके दोस्त उन्हें चंद कहकर बुलाने लगे और यह उनके नाम का हिस्सा हो गया और इस तरह ध्यान सिंह ध्यान चंद हो गये. तीन दिसंबर 1979 को उनका देहांत हो गया. वर्ष 2014 में उन्हें भारत रत्न देने की सिफारिश की गयी थी, लेकिन अभी तक उन्हें देश का सर्वोच्च सम्मान नहीं मिल सका है.

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