आज बन रहे दुर्लभ शुभ योग, यहां से जानें भगवान कार्तिकेय और तारकासुर की पौराणिक कथा

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भगवान कार्तिकेय द्वारा तारकासुर वध की पौराणिक कथा

Skanda Shashthi Katha: स्कंद षष्ठी भगवान कार्तिकेय को समर्पित विशेष पर्व है. जानिए इसका महत्व, पूजा मुहूर्त और भगवान कार्तिकेय द्वारा तारकासुर वध की अद्भुत पौराणिक कथा.

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Skanda Shashthi Katha: हिंदू धर्म में स्कंद षष्ठी का पर्व अत्यंत पवित्र और विशेष माना जाता है. यह दिन भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र भगवान कार्तिकेय की आराधना के लिए समर्पित होता है. भगवान कार्तिकेय को स्कंद, मुरुगन और कुमारस्वामी जैसे कई नामों से जाना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने वाले भक्तों पर भगवान कार्तिकेय की विशेष कृपा बनी रहती है, जिससे जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता का आगमन होता है.

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Religion

आज यानी 19 जून, शुक्रवार को स्कंद षष्ठी मनाई जा रही है. इस बार इस पर्व का महत्व और अधिक बढ़ गया है क्योंकि कई शुभ योगों का दुर्लभ संयोग भी बन रहा है, जो पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों के लिए बेहद शुभ माना जा रहा है.

षष्ठी तिथि और पूजा के शुभ मुहूर्त

वैदिक पंचांग के अनुसार, षष्ठी तिथि 19 जून को शाम 5 बजे प्रारंभ होगी और 20 जून को दोपहर 3 बजकर 47 मिनट तक रहेगी. पूजा-अर्चना के लिए ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:03 बजे से 4:43 बजे तक रहेगा. वहीं अमृत काल सुबह 8:36 बजे से 10:06 बजे तक रहेगा.

इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:54 बजे से दोपहर 12:50 बजे तक और विजय मुहूर्त दोपहर 2:42 बजे से 3:38 बजे तक रहेगा. इस दिन रवि योग और निशिता मुहूर्त का शुभ संयोग भी बन रहा है, जो स्कंद षष्ठी के आध्यात्मिक महत्व को और अधिक बढ़ा रहा है.

भगवान कार्तिकेय और तारकासुर की पौराणिक कथा

हिंदू पौराणिक कथाओं में भगवान कार्तिकेय और दैत्यराज तारकासुर की कथा अत्यंत प्रसिद्ध है. यह कहानी केवल अच्छाई और बुराई की लड़ाई नहीं बल्कि धर्म, साहस और दिव्य उद्देश्य की भी प्रतीक मानी जाती है.

कैसे शक्तिशाली बना तारकासुर?

तारकासुर एक शक्तिशाली असुर था जिसने भगवान ब्रह्मा को कठोर तपस्या से प्रसन्न किया. प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे वरदान दिया कि उसकी मृत्यु केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही हो सकती है. तारकासुर को विश्वास था कि माता सती के निधन के बाद भगवान शिव संसार से विरक्त हो चुके हैं और वह कभी विवाह नहीं करेंगे. इसलिए उसे लगा कि उसकी मृत्यु असंभव है. इस वरदान के कारण उसका अहंकार बढ़ गया और उसने देवताओं, मनुष्यों और स्वर्ग लोक तक पर अत्याचार करना शुरू कर दिया.

भगवान कार्तिकेय का जन्म

देवताओं को ज्ञात था कि तारकासुर का अंत केवल शिव पुत्र ही कर सकते हैं. तब देवताओं ने माता पार्वती की सहायता से भगवान शिव और पार्वती के दिव्य मिलन का मार्ग प्रशस्त किया. उनके दिव्य तेज से भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ. कहा जाता है कि छह कृतिका देवियों ने उनका पालन-पोषण किया, जिसके कारण उनका संबंध संख्या छह से माना जाता है. भगवान कार्तिकेय बचपन से ही अद्भुत शक्ति, बुद्धिमत्ता और वीरता से संपन्न थे.

तारकासुर और कार्तिकेय का युद्ध

युवा होने के बाद भगवान कार्तिकेय को देवताओं की सेना का सेनापति बनाया गया. उन्हें कई दिव्य अस्त्र प्राप्त हुए, जिनमें माता पार्वती द्वारा दिया गया दिव्य भाला “वेल” सबसे महत्वपूर्ण था. युद्ध के दौरान देवताओं और असुरों के बीच भीषण संघर्ष हुआ. जब भगवान कार्तिकेय और तारकासुर आमने-सामने आए तो एक भयंकर युद्ध शुरू हुआ. अंततः भगवान कार्तिकेय ने अपने दिव्य भाले “वेल” से तारकासुर का वध कर दिया.

तारकासुर के अंत के साथ ही देवताओं ने विजय उत्सव मनाया और ब्रह्मांड में पुनः शांति और संतुलन स्थापित हुआ.

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कथा का आध्यात्मिक संदेश

भगवान कार्तिकेय और तारकासुर की यह कथा हमें सिखाती है कि अहंकार, अन्याय और बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंत में सत्य और धर्म की विजय निश्चित होती है. भगवान कार्तिकेय साहस, कर्तव्य और निस्वार्थ सेवा के प्रतीक माने जाते हैं, जो आज भी भक्तों को जीवन में सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं.

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